बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 134, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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उस इस प्राणदेवताने इन देवताओंके पापरूप मृत्युको दूरकर फिर इन्हें मृत्युके पार [ अग्न्यादि देवतात्मभावको प्राप्त ] कर दिया ॥ ११ ॥
| सा वा एषा देवता, तदेतत्प्राणात्मज्ञानकर्मफलं वागादीनामग्न्याद्यात्मत्वमुच्यते । अथैना मृत्युमत्यवहत् यस्मादाध्यात्मिकपरिच्छेदकरः पाप्मा मृत्युः प्राणात्मविज्ञानेनापहतस्तस्मात्स प्राणोऽपहन्ता पाप्मनो मृत्योः । तस्मात्स एव प्राण एना वागादिदेवताःप्रकृतं पाप्मानं मृत्युमतीत्य अवहत्प्रापयत्स्वं स्वमपरिच्छिन्नमग्न्यादिदेवतात्मरूपम् ॥११॥ | ‘सा वा एषा देवता’ इस श्रुतिसे प्राणात्मज्ञानरूप कर्मके फलस्वरूपसे वागादिकी अग्न्यादिरूपताका वर्णन किया जाता है । इसके अनन्तर प्राणदेवताने उनको मृत्युके पार कर दिया । क्योंकि आध्यात्मिक परिच्छेदकर्ता पापरूप मृत्यु प्राणात्मज्ञानद्वारा नष्ट हो गया इसलिये प्राण पापरूप मृत्युका नाश करनेवाला है । अतः उस प्राणने ही इन वागादि देवताओंको, इनके प्रकृत पापरूप मृत्युको पारकर, इनके अपरिच्छिन्न अग्न्यादि देवतात्मस्वरूपको प्राप्त करा दिया ॥ ११ ॥ |
स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्सा यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत्सोऽयमग्निः परेण मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते ॥ १२ ॥
उस प्रसिद्ध प्राणने प्रधान वाग्देवताको [ मृत्युके ] पार पहुँचाया । वह वाक् जिस समय मृत्युसे पार हुई यह अग्नि हो गयी। वह यह अग्नि मृत्युसे परे उसका अतिक्रमण करके देदीप्यमान है ॥ १२ ॥
| स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत् । स प्राणो वाचमेव प्रथमां प्रधानामित्येतत् । उद्गीथकर्मणी- | ‘स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्’— उस प्रसिद्ध प्राणने प्रथमा यानी प्रधाना वाक्का [मृत्युसे] अतिवहन किया । उद्गीथकर्ममें अन्य |