भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 135

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ १२९


| तरकरणापेक्षया साधकतमत्वं प्राधान्यं तस्याः । तां प्रथमाम-त्यवहद्वहनं कृतवान् ।<br><br>तस्याः पुनर्मृत्युमतीत्योढायाः किं रूपम्? इत्युच्यते-सा वाग्यदा यस्मिन्काले पाप्मानं मृत्युम् अत्यमुच्यतातित्यामुच्यत मौचि-ता स्वयमेव, तदा सोऽग्निरभवत्। सा वाक्पूर्वमप्यग्निरेव सती मृत्युवियोगेऽप्यग्निरेवाभवत् । एतावांस्तु विशेषो मृत्युवियोगे ।<br><br>सोऽयमतिक्रान्तोऽग्निः परेण मृत्युं परस्तान्मृत्योर्दीप्यते । प्राङ् मोक्षान्मृत्युप्रतिबद्धो अध्यात्म-वागात्मना नेदानीमिव दीप्ति-मानासीत्, इदानीं तु मृत्युं परेण दीप्यते मृत्युवियोगात् ॥१२॥ | इन्द्रियोंकी अपेक्षा साधकतम होना ही उसकी प्रधानता है । उस प्रथमा वाग्देवताका उसने अतिवहन किया ।<br><br>किंतु मृत्युको पार करके ले जाय़ी गयी उस वाणीका क्या रूप है, सो बतलाया जाता है—वह वाक् जब—जिस समयमें पापरूप मृत्युको पार करके मुक्त हुई—स्वयं ही मृत्युसे छूट गयी, उस समय वह अग्नि हो गयी । वह वाक् पहले भी अग्निरूपा ही थी, अब मृत्युका वियोग हो जानेपर भी अग्नि ही हो गयी । विशेषता इतनी ही है कि मृत्युका वियोग होनेपर ।<br><br>वह यह [ मृत्युको ] अतिक्रान्त करनेवाला अग्नि 'परेण मृत्युम्'—मृत्युसे परे देदीप्यमान है, उससे मुक्त होनेसे पूर्व अध्यात्मवाग्रूप मृत्युसे प्रतिबद्ध होनेके कारण वह इस समयके समान दीप्तिमान् नहीं था; अब मृत्युका वियोग हो जानेके कारण वह मृत्युसे परे होकर देदीप्यमान है ॥ १२ ॥ |


अथ प्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत स वायुरभवत्सोऽयं वायुः परेण मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥१३॥

बृ० उ० ६—