बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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फिर प्राणका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ वह वायु हो गया। वह यह अतिक्रान्त वायु मृत्युसे परे बहता है ॥१३॥
| तथा प्राणो घ्राणम्—वायुरभवत्। स तु पवते मृत्युं परेणातिक्रान्तः। सर्वमन्यदुक्तार्थम् ॥१३॥ | इसी प्रकार प्राण अर्थात् घ्राण-वायु हो गया। वह मृत्युसे पार होकर बहता है। और सबका अर्थ कहा जा चुका है ॥ १३ ॥ |
अथ चक्षुरत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स आदित्योऽभवत्सोऽसावादित्यः परेण मृत्युमतिक्रान्तस्तपति ॥ १४ ॥
फिर चक्षुका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ यह आदित्य हो गया। वह यह अतिक्रान्त आदित्य मृत्युसे परे तपता है ॥१४॥
| तथा चक्षुरादित्योऽभवत्स तु तपति ॥ १४ ॥ | इसी प्रकार चक्षु आदित्य हो गया और वह तपता है ॥ १४ ॥ |
अथ श्रोत्रमत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ता दिशोऽभवंस्ता इमा दिशः परेण मृत्युमतिक्रान्ताः ॥१५॥
फिर श्रोत्रका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ यह दिशा हो गया। वे ये अतिक्रान्त दिशाएँ मृत्युसे परे हैं ॥ १५ ॥
| तथा श्रोत्रं दिशोऽभवत्। दिशः प्राच्यार्दिभागेनावस्थिताः ॥१५॥ | तथा श्रोत्र दिशा हो गया। दिशाएँ पूर्वाधिके विभागसे स्थित हैं ॥ १५ ॥ |