भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1346, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1346
१३३०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

| निरूपयेत् । यत्पात्रावलिप्तं तत् पात्रं सर्वं निर्णिज्य तूष्णीं पिबेत् । पाणी प्रक्षाल्याप आचम्य जघनेनाग्निं पश्चादग्नेः प्राक्शिराः संविशति । प्रातःसंध्यामुपास्यादित्यमुपतिष्ठते दिशामेकपुण्डरीकमित्यनेन मन्त्रेण । यथेतं यथागतमेत्यागत्य जघनेनाग्निमासीनो वंशं जपति ॥ ६ ॥ | ही विभाग कर ले । जो कुछ पात्रमें लगा रह जाय उस पात्रको धोकर उस सबको चुपचाप पी जाय । फिर दोनों हाथ धोकर जलसे आचमन कर 'जघनेन अग्निम्' अर्थात् अग्निके पश्चिम भागमें पूर्वकी ओर शिर करके बैठता है । प्रातःकालिक संध्योपासन कर 'दिशामेकपुण्डरीकमसि' इस मन्त्रसे आदित्यका उपस्थान करता है । फिर जिस मार्गसे गया था उसीसे लौटकर अग्निके पश्चिम भागमें बैठकर [ इस ] वंशको जपता है ॥ ६ ॥ |

मन्थकर्मका वंश

तँहैतमुद्दालक आरुणिर्वाजसनेयाय याज्ञवल्क्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनँशुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ७ ॥

उस इस मन्थका उद्दालक आरुणिने अपने शिष्य वाजसनेय याज्ञवल्क्यको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इस मन्थको सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उससे शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे' ॥ ७ ॥

एतमु हैव वाजसनेयो याज्ञवल्क्यो मधुकाय पैङ्ग्यायान्तेवासिन उक्त्वोवाचापि य एनँशुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ८ ॥