बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1345, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३२९
भवन्तु'--किरणें अथवा दिशाएँ हमारे लिये सुखकर हों। 'स्वः स्वाहा' [ इतने अर्थवाले मन्त्रसे तृतीय ग्रास भक्षण करे ]। इसके पश्चात् सम्पूर्ण सावित्री (गायत्रीमन्त्र), 'मधु वाता ऋतायते' इत्यादि समस्त मधुमती ऋचा और 'अहमेवेदं सर्वं भूयासम्' (यह सब मैं ही हो जाऊँ) 'भूर्भुवः स्वाहा' इस प्रकार कहकर अन्तमें समस्त मन्थको भक्षण कर दोनों हाथ धो अग्निके पश्चिम भागमें पूर्वकी ओर सिर करके बैठता है। प्रातःकालमें 'दिशामेकपुण्डरीकमस्यहं...........भूयासम्'¹ इस मन्त्रद्वारा आदित्यका उपस्थान (नमस्कार) करता है। फिर जिस मार्गसे गया होता है, उसीसे लौटकर अग्निके पश्चिम भागमें बैठकर [ आगे कहे जानेवाले ] वंशको जपता है॥ ६॥
| अथैनमाचामति भक्षयति । गायत्र्याः प्रथमपादेन मधुमत्यैकया व्याहृत्या च प्रथमया प्रथमग्रासमाचामति; तथा गायत्रीद्वितीयपादेन मधुमत्या द्वितीयया द्वितीयया च व्याहृत्या द्वितीयं ग्रासम्; तथा तृतीयेन गायत्रीपादेन तृतीयया मधुमत्या तृतीयया च व्याहृत्या तृतीयं ग्रासम्। सर्वां सावित्रीं सर्वाश्च मधुमतीरुक्त्वाहमेवेदं सर्वं भूयासमिति चान्ते भूर्भुवः स्वः स्वाहेति समस्तं भक्षयति ।<br><br>यथा चतुर्भिर्ग्रासैस्तद् द्रव्यं सर्वं परिसमाप्यते तथा पूर्वमेव | इसके पश्चात् वह मन्थको भक्षण करता है। गायत्रीके प्रथम पाद, एक मधुमती ऋचा और एक व्याहृतिसे प्रथम ग्रास खाता है तथा गायत्रीके द्वितीय पाद, द्वितीय मधुमती ऋचा और द्वितीय व्याहृतिसे दूसरा ग्रास खाता है और गायत्रीके तृतीय पाद, तृतीय मधुमती ऋचा और तृतीय व्याहृतिसे अन्तमें तीसरा ग्रास भक्षण करता है। फिर समस्त गायत्री, सम्पूर्ण मधुमती ऋचा और 'मैं ही यह सब हो जाऊँ' ऐसा कहते हुए 'भूर्भुवः स्वः स्वाहा' ऐसा कहकर समस्त मन्थको भक्षण कर जाता है।<br><br>वह सारा द्रव्य जिस प्रकार चार ग्रासोंमें समाप्त हो जाय इसका पहले |
१. तू दिशाओंका एक पुण्डरीक [अर्थात् अखण्ड श्रेष्ठ] है, मैं मनुष्योंमें एक पुण्डरीक होऊँ।
बृ० उ०—८४