भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1348, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1348
१३३२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

प्ररोहेयुः पलाशानीति तमेतं नापुत्राय वानन्तेवासिने वा ब्रूयात् ॥ १२ ॥

उस इस मन्थका सत्यकाम जाबालने अपने शिष्योंको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी और पत्ते निकल आयेंगे।' उस इस मन्थका जो पुत्र या शिष्य न हो, उसे उपदेश न करे ॥ १२ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तं हैतमुद्दालक इत्यादि सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेञ्जायेरन्नेवास्मिञ्शाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीत्येवमन्तमेनं मन्थमुद्दालकात् प्रभृत्येकैकाचार्यक्रमागतं सत्यकाम आचार्यो बहुभ्योऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाच । किमन्यदुवाचेत्युच्यते—अपि य एनं शुष्के स्थाणौ गतप्राणेऽप्येनं मन्थं भक्षणाय संस्कृतं निषिञ्चेत् प्रक्षिपेज्जायेरन्नुत्पद्येरन्नेवास्मिन् स्थाणौ शाखा अवयवा वृक्षस्य प्ररोहेयुश्च पलाशानि पर्णानि यथा जीवितः स्थाणोः; किमुतानेन कर्मणा कामः सिद्ध्येदिति । ध्रुवफलमिदं कर्मेति कर्मस्तुत्यर्थमेतत् ।'तं हेतमुद्दालकः' यहाँसे आरम्भ करके 'सत्यकामो जाबालोऽन्तेवासिभ्य उक्त्वोवाचापि······प्ररोहेयुः पलाशानि' यहाँतक उद्दालकसे लेकर एक-एक आचार्यके क्रमसे प्राप्त हुए इस मन्थका सत्यकाम जाबालने बहुत-से शिष्योंको उपदेश करके कहा । और क्या कहा, सो बतलाया जाता है—'यदि कोई भक्षणके लिये संस्कार किये गये इस मन्थको किसी शुष्क—गतप्राण स्थाणु (ठूँठ) पर भी डाल दे तो इस ठूँठमें शाखाएँ—वृक्षके अवयव उत्पन्न हो जायँगे और पत्ते भी निकल आयेंगे, जैसे कि जीवित स्थाणु (हरे ठूँठ) में होत हैं; फिर इस कर्मसे यदि कामनाकी सिद्धि हो जाय तो कौन बड़ी बात है ? तात्पर्य यह है कि यह कर्म निश्चित फल देनेवाला है—इस प्रकार यह उक्ति कर्मकी स्तुतिके लिये है।