भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1349, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1349

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३३


| विद्याधिगमे षट्तीर्थानि तेषामिह सप्राणदर्शनस्य मन्थविज्ञानस्याधिगमे द्वे एव तीर्थे अनुज्ञायेते पुत्रश्चान्तेवासी च ॥ ७-१२ ॥ | विद्याप्राप्तिके छः^१ तीर्थ (अधिकारी) हैं, उनमेंसे इस प्राणदर्शनयुक्त मन्थविज्ञानकी प्राप्तिकी अनुज्ञा पुत्र और शिष्य दो ही तीर्थोंके लिये है ॥ ७-१२ ॥ |


मन्थकर्मकी सामग्रीका विवरण

चतुरौदुम्बरो भवत्यौदुम्बरः स्रुव औदुम्बरश्चमस औदुम्बर इध्म औदुम्बर्या उपमन्थन्यौ दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियङ्गवो गोधूमाश्च मसूराश्च खल्वाश्च खलकुलाश्च तान् पिष्टान् दधनि मधुनि घृत उपसिञ्चत्याज्यस्य जुहोति ॥ १३ ॥

यह मन्थकर्म चतुरौदुम्बर (चार औदुम्बर काष्ठके पदार्थोंवाला) है। इसमें औदुम्बरकाष्ठ (गूलरकी लकड़ी) का स्रुव, औदुम्बरकाष्ठका चमस, औदुम्बरकाष्ठका इध्म और औदुम्बरकाष्ठकी दो उपमन्थनी होती हैं। इसमें व्रीहि (धान), यव (जौ), तिल, माष (उड़द), अणु (साँवा), प्रियङ्गु (काँगनी), गोधूम (गेहूँ), मसूर, खल्व (बाल) और खलकुल (कुलथी)—दश ग्रामीण अन्न उपयुक्त होते हैं। उन्हें पीसकर दही, मधु और घृतमें मिलाकर घृतसे हवन करता है ॥ १३ ॥

| चतुरौदुम्बरो भवतीति व्याख्यातम् । दश ग्राम्याणि धान्यानि भवन्ति ग्राम्याणां | 'चतुरौदुम्बरो भवति' इस वाक्यकी व्याख्या श्रुतिने स्वयं की है। दश ग्राम्य धान्य होते हैं। हम पहले कह चुके हैं कि ग्राम्य धान्योंमेंसे |


१. शिष्य, वेदाध्यायी श्रोत्रिय, धारणाशक्तिसम्पन्न पुरुष, धन देनेवाला, प्रिय पुत्र और जो एक विद्या सीखकर दूसरी सिखानेवाला हो—ये छः विद्यादानके अधिकारी हैं।