बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1350, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| तु धान्यानां दश नियमेन ग्राह्या इत्यवोचाम । के त इति निर्दिश्यन्ते—व्रीहियवास्तिलमाषा अणुप्रियङ्गवोऽणवश्चाणुशब्दवाच्याः। क्वचिद्देशे प्रियङ्गवः प्रसिद्धाः कङ्गुशब्देन। खल्वा निष्पावा वल्लशब्दवाच्या लोके खलकुलाः कुलत्थाः । एतद्व्यतिरेकेण यथाशक्ति सर्वौषधयोग्राह्याः फलानि चेत्यवोचामायाज्ञिकानि वर्जयित्वा ॥ १३ ॥ | दश तो अवश्य ग्रहण करने चाहिये। वे कौन-से हैं, सो बतलाये जाते हैं—व्रीहि, यव, तिल, माष, अणु, प्रियङ्गु, ‘अणु’ शब्दके वाच्य अणु (चावलोंका एक भेद) हे तथा प्रियङ्गु किसी-किसी देशमें कङ्गु (काँगनी) शब्दसे प्रसिद्ध हैं। खल्व या निष्पाव लोकमें वल्ल (बाल) शब्दसे कहे जाते हैं। खलकुल कुलत्थों (कुलथी) को कहते हैं। इनके अतिरिक्त जो यज्ञसम्बन्धी नहीं हैं, उन्हें छोड़कर यथाशक्ति सभी ओषधियां और फल लेने चाहिये—यह हम कह चुके हैं ॥ १३ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये तृतीयं श्रीमन्थब्राह्मणम् ॥ ३ ॥
चतुर्थ ब्राह्मण
सन्तानोत्पत्ति-विज्ञान अथवा पुत्रमन्थ कर्म¹
| यादृग्जन्मा यथोत्पादितो यैर्वा गुणैर्विशिष्टः पुत्र आत्मनः | जिस प्रकार जन्म लेनेवाला, जिस विधिसे उत्पन्न किया हुआ अथवा जिन गुणोंसे विशिष्टताको प्राप्त हुआ पुत्र |
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¹ १. पूर्वोक्त तीसरे ब्राह्मणमें धनार्थी प्राणोपासकके लिये ‘श्रीमन्थ’ कर्मका विधिपूर्वक वर्णन किया गया है; अब इच्छानुसार सद्गुणयुक्त संतान उत्पन्न करनेकी युक्ति बतानेके लिये ‘पुत्रमन्थ’ कर्मका वर्णन आरम्भ करते हैं ।