भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1351, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1351

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १३३५


| पितुश्च लोक्यो भवतीति तत्सम्पादनाय ब्राह्मणमारभ्यते। प्राणदर्शिनः श्रीमन्थं कर्म कृतवतः पुत्रमन्थेऽधिकारः। यदा पुत्रमन्थं चिकीर्षति तदा श्रीमन्थं कृत्वर्तुकालं पत्न्याः प्रतीक्षत इत्येतद्रेतस ओषध्यादिरसतमत्वस्तुत्यावगम्यते— | अपने तथा पिताके लिये लोक-परलोकमें हितकारी होता है; वैसे पुत्रकी उत्पत्ति कैसे हो ? यह बतानेके लिये अथवा ऐसे पुत्रकी प्राप्तिके उपायका सम्पादन करनेके लिये यह चतुर्थ ब्राह्मण प्रारम्भ किया जाता है। जिस प्राणोपासक पुरुषने श्रीमन्थ कर्मका सम्पादन कर लिया है, उसीका पुत्रमन्थ-कर्ममें अधिकार है। साधक जब पुत्रमन्थ करना चाहता है, तब वह श्रीमन्थ-कर्मका अनुष्ठान करके पत्नीके ऋतुकालकी प्रतीक्षा करता है; यह बात रेतस् (शुक्र) को ओषधि आदिका रसतम (सारतम) बताकर उसकी प्रशंसा करनेसे जानी जाती है— |

एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपोऽपामोषधय ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः पुरुषस्य रेतः ॥ १ ॥

इन भूतोंका रस पृथिवी है, पृथिवीका रस जल है, जलका रस-ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस पुष्प है, पुष्पोंका रस फल है, फलोंका रस (आधार) पुरुष है तथा पुरुषका रस (सार) शुक्र है ॥ १ ॥

| एषां वै चराचराणां भूतानां पृथिवी रसः सारभूतः, सर्वभूतानां मध्विति ह्युक्तम् । पृथिव्या आपो रसः; अप्सु हि पृथिव्योता च | इन चर-अचर समस्त भूतोंका रस-सारभूत तत्त्व पृथिवी है; क्योंकि 'पृथिवी सब भूतोंका मधु (सार) है', यह बात मधु ब्राह्मणमें कह आये हैं। पृथिवी- |