भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1352, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1352
१३३६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

| प्रोता च। अपामोषधयो रसः कार्यत्वाद् रसत्वमोषध्यादीनाम्। ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि; फलानां पुरुषः; पुरुषस्य रेतः। "सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतम्" (ऐतरेय० २।१।१) इति श्रुत्यन्तरात् ॥ १ ॥ | का रस जल है; क्योंकि पृथिवी जलमें ओतप्रोत है। जलका रस ओषधियाँ (अन्न) है। जलका कार्य होनेके कारण ओषधियोंको उसका रस बताया गया है। ओषधियोंका रस फूल, फूलोंका रस फल, फलोंका रस पुरुष और पुरुषका रस रेतस् (शुक्र) है। यह बात 'यह वीर्य पुरुषके सम्पूर्ण अङ्गोंसे उत्पन्न हुआ तेज हे' इस दूसरी श्रुतिसे भी प्रमाणित होती है ॥ १ ॥ | | यत्त एवं सर्वभूतानां सारतममेतद् रेतोऽतः का नु खल्वस्य योग्या प्रतिष्ठेति— | यदि इस प्रकार यह रेतस् (वीर्य) सम्पूर्ण भूतोंका सारतम तत्त्व है, तो इसके आधानके योग्य प्रतिष्ठा (आधारभूमि) क्या है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— |

स ह प्रजापतिरीक्षांचक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्त्रियँ ससृजे ताँ सृष्ट्वाध उपास्त तस्मात् स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन एव समुदपारयत्तैनेनामभ्यसृजत ॥ २ ॥

सुप्रसिद्ध प्रजापतिने विचार किया कि मैं इस वीर्यकी स्थापनाके लिये किसी योग्य प्रतिष्ठा (आधार-भूमि) का निर्माण करूँ, अतः उन्होंने स्त्रीकी सृष्टि की। उसकी सृष्टि करके उन्होंने उसके अधोभागकी उपासना की (मैथुनकर्मका विधान किया); अतः स्त्रीके अधोभागकी उपासना (सेवन) करे। प्रजापतिने इस उत्कृष्ट गतिशील प्रस्तरखण्ड-सदृश शिश्नेन्द्रियको (उत्पन्न करके उसे) स्त्रीकी (योनिकी) ओर प्रेरित किया, उससे इस स्त्रीका संसर्ग किया ॥ २ ॥