बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1356, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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'बहुत-से ऐसे मरणधर्मा नाममात्रके ब्राह्मण हैं, जो निरिन्द्रिय, सुकृतहीन और मैथुन-विज्ञानसे अपरिचित होकर भी मैथुनकर्ममें आसक्तिपूर्वक प्रवृत्त होते हैं, वे परलोकसे भ्रष्ट हो जाते हैं। यदि पत्नीका ऋतुकाल प्राप्त होने-से पूर्व इस प्राणोपासकका वीर्य अधिक या कम सोते समय अथवा जागते समय गिर जाता है (तो उसे निम्नाङ्कित प्रायश्चित्त करना चाहिये) ॥ ४॥
| एतद्ध स्म वै तद् विद्वानुद्दालक आरुणिराहाधोपहासाख्यं मैथुनकर्म वाजपेयसम्पन्नं विद्वानित्यर्थः; तथा नाको मौद्गल्यः कुमारहारितश्च किं त आहुः ? इत्युच्यते—बहवो मर्या मरणधर्मिणो मनुष्या ब्राह्मणा अयनं येषां ते ब्राह्मणायना ब्रह्मबन्धवो जातिमात्रोपजीविन इत्येतत् । निरिन्द्रिया विश्लिष्टेन्द्रिया विसुकृतो विगतसुकृतकर्माणोऽविद्वांसो मैथुनकर्मासक्ता इत्यर्थः। ते किमस्माल्लोकात् प्रयन्ति परलोकात् परिभ्रष्टा इति । मैथुनकर्मणोऽत्यन्तपापहेतुत्वं दर्शयति—य इदमविद्वांसोऽधोपहासं चरन्तीति । | अरुणनन्दन उद्दालक निश्चय ही इसको पूर्वोक्त रूपसे जानकर अर्थात् 'अधोपहास' नामक मैथुनकर्म वाजपेय यज्ञके महत्त्वसे सम्पन्न है, ऐसा जानकर तथा मुद्गलपुत्र नाक और कुमारहारित भी इसे उक्त रूपमें जानकर कहते हैं; वे क्या कहते हैं? यह बता रहे हैं—बहुत-से ऐसे मर्य—मरणधर्मी मनुष्य ब्राह्मणायन—ब्राह्मण हैं अयन जिनके वे ब्रह्मबन्धु अर्थात् ब्राह्मण जातिका नाम लेकर जीनेवाले, निरिन्द्रिय—जिनकी इन्द्रियाँ संयुक्त न रहकर बिलग-बिलग बिखरी रहती हैं तथा विसुकृत्—पुण्यकर्मरहित अर्थात् मैथुन-विज्ञानसे अपरिचित होते हुए भी मैथुनकर्ममें आसक्त पुरुष हैं, वे क्या होते हैं? वे परलोकभ्रष्ट हो जाते हैं। मैथुनकर्म अत्यन्त पापका हेतु है—यह दिखाते हैं—'जो अविद्वान् इसे न जानते हुए भी मैथुनका सेवन करते हैं' इत्यादि। |