बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1357, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३४१
| श्रीमन्थं कृत्वा पत्न्या ऋतु- | श्रीमन्थ करके जो ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक पत्नीके ऋतुकालकी |
|---|---|
| कालं ब्रह्मचर्येण प्रतीक्षते यदीदं | प्रतीक्षा करता हे, उसका यह वीर्य |
| रेतः स्कन्दति बहु वाल्पं वा | यदि रागकी प्रबलताके कारण थोड़ा या अधिक, सोते समय |
| सुप्तस्य वा जाग्रतो वा राग- | अथवा जागते समय गिर जाय, |
| प्राबल्यात् ॥ ४ ॥ | (तो वह निम्नाङ्कित प्रायश्चित्त करे) ॥ ४ ॥ |
तदभिमृशेदनु वा मन्त्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कान्त्सीद् यदोषधीरप्यसरद् यदपः। इदमहं तद्रेत आददे पुनर्मामैत्विन्द्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः। पुनरग्नर्धिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकाङ्गुष्ठाभ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात् ॥५॥
उस वीर्यको हाथसे छूए तथा अभिमन्त्रित करे—स्पर्श करते समय इस प्रकार कहे—'आज जो मेरा वीर्य स्खलित होकर पृथिवीपर गिरा है, जो पहले कभी अन्नमें भी गिरा है तथा जो जलमें पड़ा है उस इस वीर्यको मैं ग्रहण करता हूँ।' ऐसा कहकर अनामिका और अङ्गुष्ठसे उस वीर्यको ग्रहण करके दोनों स्तनों अथवा भौंहोंके बीचमें लगावे। लगाते समय इस प्रकार कहे—'(जो स्खलित वीर्यरूपसे बाहर निकल गयी थी, वह मेरी) इन्द्रिय पुनः मेरे पास लौट आवे। मुझे पुनः तेज और पुनः सौभाग्यकी प्राप्ति हो। अग्नि ही जिनके स्थान हैं, वे देवगण पुनः मेरे शरीरमें उस वीर्यको यथास्थान स्थापित कर दें' ॥ ५ ॥
| तदभिमृशेदतुमन्त्रयेत वानुज- | उसका स्पर्श एवं अनुमन्त्रण (अभिमन्त्रण) अर्थात् बार-बार जप |
|---|---|
| पेदित्यर्थः। यदाभिमृशति तदा- | करे। जब स्पर्श करे तब 'यन्मे... ......से लेकर आददे' तक मन्त्र पढ़ |
| नामिकाङ्गुष्ठाभ्यां तद्रेत आदत्त | कर अनामिका और अङ्गुष्ठसे उस |