भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 138
१३२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| यथा वागादिभिरात्मार्थमागानं कृतं तथा मुख्योऽपि प्राणः सर्वप्राणसाधारणं प्राजापत्यफलमागानं कृत्वा त्रिषु पवमानेषु, अथानन्तरं शिष्टेषु नवसु, स्तोत्रेषु, आत्मने आत्मार्थमन्नाद्यमन्नं च तदाद्यं चान्नाद्यमागायत्। | जिस प्रकार वागादिने अपने लिये आगान किया था उसी प्रकार मुख्य प्राणने भी तीन पवमानोंमें समस्त प्राणोंके लिये समान प्राजापत्यरूप फलका आगान कर इसके पश्चात् शेष नौ स्तोत्रोंमें अपने लिये अन्नाद्यका¹—जो अन्न हो और आद्य (भक्ष्य) भी हो उस अन्नाद्यका आगान किया। | | कर्तुः कामसंयोगो वाचनिक इत्युक्तम्। कथं पुनस्तदन्नाद्यं प्राणेनात्मार्थमागीतमिति गम्यते? | उद्गानकर्ताको जो यह इच्छित पदार्थका संयोग होता है, वह वाचनिक है—ऐसा पहले² कहा जा चुका है। किंतु प्राणने उस अन्नाद्यका अपने लिये आगान किया—यह कैसे जाना जाता है? | | इत्यत्र हेतुमाह—यत्किञ्चेति सामान्यान्नमात्रपरामर्शार्थः। हीति हेतौ। यस्माल्लोके प्राणिभिर्यत्किञ्चिदन्नमद्यते भक्ष्यते तदनेनैव। अन इति प्राणस्याख्या प्रसिद्धा अनःशब्दः सान्तः शकटवाची, यस्त्वन्यः स्वरान्तः स प्राणपर्यायः। | इसमें श्रुति हेतु बतलाती है—'यत्किञ्च'—यह पद सामान्यरूपसे अन्नमात्रका परामर्श करनेके लिये है। 'हि' यह अव्यय हेत्वर्थमें है। अर्थात् क्योंकि लोकमें प्राणियोंद्वारा जो कुछ भी अन्न भक्षण किया जाता है वह अन—प्राणके द्वारा ही खाया जाता है। 'अन' यह प्राणका नाम प्रसिद्ध है। सान्त 'अनस्' शब्द शकटका वाचक है और जो दूसरा स्वरान्त (अकारान्त) है वह प्राणका |


१. 'अथात्मनेऽन्नाद्यमागायत्' इस श्रुतिवचनसे विहित।
२. मन्त्र १।३।२ के भाष्यमें।