बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 139, कुल 1402 में से
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| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १३३ |
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| प्राणेनैव तदद्यत इत्यर्थः ।<br><br>किञ्च न केवलं प्राणेनाद्यत एवान्नाद्यम्, तस्मिञ्छरीराकारपरिणतेऽन्नाद्य इह प्रतितिष्ठति प्राणः । तस्मात्प्राणेनात्मनः प्रतिष्ठार्थमागीतमन्नाद्यम् । यदपि प्राणेनान्नादनं तदपि प्रतिष्ठार्थमेवेति न वागादिष्विव कल्याणासङ्गजपाप्मसम्भवः प्राणेऽस्ति ॥ १७ ॥ | पर्याय है, अतः वह अनेन अर्थात् प्राणसे ही खाया जाता है ।<br><br>इसके सिवा अन्नाद्य प्राणसे केवल खाया ही नहीं जाता, अपि तु उस अन्नाद्यके शरीराकारमें परिणत होनेपर उसमें ही प्राण प्रतिष्ठित होता है । अतः अपनी प्रतिष्ठाके लिये प्राणने अन्नाद्यका आगान किया । प्राणके द्वारा जो अन्नका अदन ( भक्षण ) होता है वह भी उसकी प्रतिष्ठाके ही लिये है; अतः वागादिके समान प्राणमें शुभाभिनिवेशजनित पापकी सम्भावना नहीं है ॥ १७ ॥ |
प्राणका सर्वपोषकत्व और उसकी इस प्रकारकी उपासनाका फल
| नन्ववधारणमयुक्तं प्राणेनैव तदद्यत इति, वागादीनामपि अन्ननिमित्तोपकारदर्शनात् ।<br><br>नैष दोषः; प्राणद्वारत्वात्तदुपकारस्य । कथं प्राणद्वारकोऽन्नकृतो वागादीनामुपकार इत्येतमर्थं प्रदर्शयन्नाह— | शङ्का—किंतु ऐसा जो निश्चय किया है कि वह अन्न प्राणके ही द्वारा खाया जाता है यह तो ठीक नहीं है, क्योंकि अन्नसे होनेवाला उपकार तो वागादिको भी होता देखा जाता है ।<br><br>समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि वह उपकार प्राणके ही द्वारा होता है । अन्नके कारण होनेवाला वागादिका उपकार प्राणके द्वारा होनेवाला कैसे है? इसी बातको दिखानेके लिये श्रुति कहती है— |