बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 141, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५
| संस्कृत शाङ्करभाष्य | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| कमस्ति । वा इति स्मरणार्थः । इदं तत्सर्वमेतावदेव, किम् ? यदन्नं प्राणस्थितिकरमद्यते लोके तत्सर्वमात्मन आत्मार्थमागासीः आगीतवानसि आगानेनात्मसात्कृतमित्यर्थः । वयं चान्न मन्तरेण स्थातुं नोत्सहामहे । अतोऽनु पश्चान्नोऽस्मानस्मिन्नन्ने आत्मार्थे तवान्ने आभजस्व आभाजयस्व । णिचोऽश्रवणं छान्दसम् । अस्मांश्चान्नभागिनः कुरु । | है । इसमें 'वै' यह निपात स्मरणके लिये है । यह वह सब इतना ही है । वह क्या ? लोकमें प्राणकी स्थिति करनेवाला जो भी अन्न भक्षण किया जाता है उस सबका तो तुमने अपने लिये आगान कर लिया; अर्थात् आगानके द्वारा उसे अपने अधीन कर लिया । हम भी अन्नके बिना रहनेमें समर्थ नहीं हैं । अतः अब पीछेसे अपने लिये आगान किये हुए अपने इस अन्नमेंसे हमें भी भाग प्राप्त कराओ, 'आभजस्व' में णिच्का श्रवण न होना छान्दस है । अर्थात् हमें भी अन्नका भागी बनाओ ।" |
| इतर आह—ते यूयं यद्यन्नार्थिनो वै, मा मामभिसंविशत समन्ततो मामाभिमुख्येन निविशत । इत्येवमुक्तवति प्राणे तथेत्येवमिति, तं प्राणं परिसमन्तं परिसमन्तान्न्यविशन्त निश्चयेनाविशन्त, तं प्राणं परिवेष्टय निविष्टवन्त इत्यर्थः । तथा निविष्टानां प्राणानुज्ञया तेषां प्राणेनैवाद्यमन्नं प्राणस्थितिकरं सदन्नं तृप्तिकरं भवति न स्वातन्त्र्येण । | तब उनसे इतर—मुख्य प्राणने कहा, "वे तुम, यदि अन्नप्राप्तिके इच्छुक हो तो सब ओरसे अभिमुख भावसे मुझमें प्रवेश कर जाओ ।" प्राणके इस प्रकार कहनेपर वे 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर उस प्राणमें निश्चय ही उसे सब ओरसे घेरकर प्रविष्ट हो गये । इस प्रकार प्राणकी आज्ञासे प्रविष्ट हुए उन सबकी, जो प्राणके द्वारा खाया जाता है वह प्राणकी स्थिति करनेवाला अन्न ही तृप्ति करनेवाला होता है । वागादिका स्वतन्त्रतासे अन्नके साथ सम्बन्ध नहीं होता । |