भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 142
१३६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| तस्माद्युक्तमेवावधारणम् अनेनैव तदद्यत इति । तदेव चाह— तस्माद्यस्मात्प्राणाश्रयतयैव प्राणानुज्ञयाभिसंनिविष्टा वागादिदेवताः तस्माद्यदन्नमनेन प्राणेनात्ति लोकस्तेनान्नेनैता वागाद्यास्तृप्यन्ति । | अतः "वह अन्न प्राणके ही द्वारा खाया जाता है" ऐसा निश्चय करना उचित ही है। वही बात श्रुति भी कहती है—अतः क्योंकि प्राणके आश्रित रहकर ही प्राणकी आज्ञासे वागादि देवता उसमें प्रविष्ट हुए हैं इसलिये लोक अन यानी प्राणके द्वारा जो अन्न खाते हैं उसी अन्नसे ये वागादि भी तृप्त होते हैं। | | वागाद्याश्रयं प्राणं यो वेद वागादयश्च पञ्च प्राणाश्रया इति तमप्येवमेवं ह वै स्वा ज्ञातय अभिसंविशन्ति वागादय इव प्राणम् । ज्ञातीनामाश्रयणीयो भवतीत्यभिप्रायः । अभिसंनिविष्टानां च स्वानां प्राणवदेव वागादीनां स्वान्नेन भर्ता भवति । तथा श्रेष्ठः पुरोऽग्रत एता गन्ता भवति वागादीनामिव प्राणः । तथान्नादोऽनामयावीत्यर्थः । अधिपतिरधिष्ठाय च पालयिता स्वतन्त्रः पतिः प्राणवदेव वागा- | वागादिके आश्रयभूत प्राणको जो 'वागादि पाँच प्राणके आश्रित हैं' इस प्रकार जानता है उसको भी इसी प्रकार ज्ञातिजन सब ओरसे आश्रित करते हैं, जैसे प्राणको वागादि। तात्पर्य यह है कि वह अपने ज्ञातियोंका आश्रय होने योग्य हो जाता है। तथा वागादिके भर्ता प्राणके समान वह भी अपने आश्रित ज्ञातिजनोंका अपने अन्नद्वारा भरण करनेवाला होता है; तथा वह उनमें श्रेष्ठ और उनके आगे जानेवाला होता है, जैसे वागादिके आगे प्राण। इसी तरह वह अन्नाद अर्थात् अनामयावी (निरामय—व्याधिशून्य) और अधिपति--वागादिके अधिपति प्राणके समान ही ज्ञातिजनोंका अधिष्ठाता होकर पालन करनेवाला अर्थात् स्वतन्त्र स्वामी होता है |