भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 143
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ१३७

संस्कृतहिन्दी
दीनाम् । य एवं प्राणं वेद तस्यै- <br> तद्यथोक्तं फलं भवति ।जो प्राणको इस प्रकार जानता है <br> उसे उपर्युक्त फल मिलता है।
किञ्च य उ हैवंविदं प्राणविदं <br> प्रति स्वेषु ज्ञातीनां मध्ये प्रतिः <br> प्रतिकूलो बुभूषति प्रतिस्पर्धी <br> भवितुमिच्छति, सोऽसुरा इव <br> प्राणप्रतिस्पर्धिनो न हैवालं न <br> पर्याप्तो भार्येभ्यो भरणीयेभ्यो <br> भवति भर्तुमित्यर्थः। अथ <br> पुनर्य एव ज्ञातीनां मध्ये एत- <br> मेवंविदं वागादय इव प्राणम् <br> अनु अनुगतो भवति, यो वैत- <br> मेवंविद मन्वेवानुवर्तयन्नेव आत्मी- <br> यान्भार्यान् बुभूषति भर्तुमि- <br> च्छति, यथैव वागादयः प्राणा- <br> नुवृत्त्यात्मबुभूषव आसन् । स <br> हैवालं पर्याप्तो भार्येभ्यो भरणी- <br> येभ्यो भवति भर्तुं नेतरः <br> स्वतन्त्रः । सर्वमेतत्प्राणगुण- <br> विज्ञानफलमुक्तम् ॥ १८ ॥इसके सिवा स्वजनों यानी <br> ज्ञातियोंमेंसे जो भी इस प्रकार <br> जाननेवाले इस प्राणवेत्ताके प्रति <br> प्रतिकूल यानी उसका प्रतिस्पर्धी <br> होना चाहता है वह प्राणके प्रति- <br> स्पर्धी असुरोंके समान अपने भर- <br> णीयों (आश्रितों) का भरण करने- <br> में अलम् अर्थात् समर्थ नहीं होता। <br> तथा ज्ञातियोंमेंसे जो भी, प्राणके <br> अनुगामी वागादिके समान, इस <br> प्रकार जाननेवाले इस प्राणवेत्ताका <br> अनु—अनुगत होता है अर्थात् जो <br> भी इस प्राणवेत्ताका अनुवर्तन करते <br> हुए ही अपने आत्मीय यानी भरणी- <br> योंका भरण करनेकी इच्छा करता <br> है, जिस प्रकार कि वागादि प्राणका <br> अनुवर्तन करते हुए अपनेको भरण <br> करनेके इच्छुक थे, वह अपने <br> भरणीयोंके प्रति उनका भरण <br> करनेमें अलम् अर्थात् समर्थ होता <br> है, अन्य जो स्वतन्त्र है वह ऐसा <br> करनेमें समर्थ नहीं होता। यह <br> सब प्राणके गौण विज्ञानका फल <br> कहा गया है ॥ १८ ॥