भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 146
१४०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| उत्क्रामत्यपसर्पति तदेव तत्रैव तदङ्गं शुष्यति नीरसं भवति शोषमुपैति । तस्मादेष हि वा अङ्गानां रस इत्युपसंहारः ।<br><br>अतः कार्यकारणनामात्मा प्राण इत्येतत्सिद्धम् । आत्मापाये हि शोषो मरणं स्यात्तस्मात्तेन जीवन्ति प्राणिनः सर्वे । तस्मादपास्य वागादीन्प्राण एवोपास्य इति समुदायार्थः ॥१९॥ | अवयवसे प्राण उत्क्रान्त—अपसर्पित हो जाता है वह अङ्ग वहाँ ही शुष्क—नीरस हो जाता है अर्थात् सूख जाता है। अतः निश्चय यही अङ्गोंका रस है—ऐसा इसका उपसंहार है।<br><br>इससे यह सिद्ध होता है कि प्राण भूत और इन्द्रियोंका आत्मा है। आत्माका वियोग होनेपर ही शोष—मरण होता है; अतः समस्त प्राणी उसीसे जीवित रहते हैं। इसलिये वागादि समस्त प्राणोंको त्यागकर प्राण ही उपासनीय है—यह इसका समुदायार्थ है ॥१९॥ |


प्राणके बृहस्पतित्वकी उपपत्ति

| न केवलं कार्यकारणयोरेवात्मा प्राणो रूपकर्मभूतयोः। किं तर्हि ?<br><br>ऋग्यजुःसाम्नां नामभूतानामात्मेति सर्वात्मकतया प्राणं स्तुवन्महीकरोत्युपास्यत्वाय— | प्राण रूपात्मक पञ्चभूतों और कर्मभूत¹ इन्द्रियोंका ही आत्मा नहीं है तो और किसका है ? वह नाम स्वरूप ऋक्, यजुः और सामका भी आत्मा है। इस प्रकार सर्वात्मकताद्वारा प्राणकी स्तुति करते हुए वेद उसके उपास्यत्वके लिये उसे महिमान्वित करता है। |

एष एव उ बृहस्पतिर्वाग्वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥

यह ही बृहस्पति है। वाक् ही बृहती है; उसका यह पति है; इसलिये यह बृहस्पति है ॥ २० ॥


१. प्रत्यक्ष प्रमाणका विषय होनेके कारण स्थूलशरीर अर्थात् भूत रूपात्मक और ज्ञान तथा क्रियाकी शक्तिवाली होनेसे इन्द्रियाँ कर्म हैं।

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