भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 147

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४१


संस्कृतहिन्दी
एष उ एव प्रकृत आङ्गिरसो बृहस्पतिः। कथं बृहस्पतिः? इत्युच्यते—वाग्वै बृहती बृहतीच्छन्दः षट्त्रिंशदक्षरा। अनुष्टुप् च वाक्। कथम्? "वाग्वा अनुष्टुप्" (नृसिं० पू० १।१) इति श्रुतेः। सा च वागनुष्टुब्बृहत्यां छन्दस्यन्तर्भवति। अतो युक्तं वाग्वै बृहतीति प्रसिद्धवद्वक्तुम्। बृहत्यां च सर्वा ऋचोऽन्तर्भवन्ति प्राणसंस्तुतत्वात्। "प्राणो बृहती प्राण ऋच इत्येव विद्यात्" इति श्रुत्यन्तरात्। वागात्मकत्वाच्चर्चां प्राणेऽन्तर्भावः।<br><br>तत्कथम्? इत्याह—तस्या वाचो बृहत्या ऋच एष प्राणः पतिः। तस्या निर्वर्तकत्वात्। कौष्ठ्याग्निप्रेरितमारुतनिर्वर्त्या हि ऋक्। पालनाद्वा वाचः पतिः। प्राणेनयह प्राण ही प्रकृत आङ्गिरस बृहस्पति है। किस प्रकार बृहस्पति है? सो बतलाया जाता है—वाक् ही बृहती—छत्तीस अक्षरोंवाली बृहती छन्द है। वाक् अनुष्टुप् भी है। किस प्रकार? "वाक् ही अनुष्टुप् है" इस श्रुतिके अनुसार। किंतु वह अनुष्टुप् वाक् बृहती छन्दमें अन्तर्भूत हो जाती है। 'अतः वाक् ही बृहती है' इस प्रकार प्रसिद्धके समान कहना उचित ही है। "प्राण बृहती है, प्राण ऋक् है—इस प्रकार ही जाने" इस अन्य श्रुतिसे प्राणरूपसे बृहतीकी स्तुति की जानेके कारण बृहतीमें भी समस्त ऋचाओंका अन्तर्भाव हो जाता है। समस्त ऋचाएँ वाग्रूपा हैं, इसलिये भी उनका प्राणमें अन्तर्भाव होता है।<br><br>सो किस प्रकार? इसपर श्रुति कहती है—उस वाक्का—बृहतीका यानी ऋक्का यह प्राण पति है, क्योंकि यही उसको ¹अभिव्यक्त करनेवाला है—जठराग्निद्वारा प्रेरित वायुसे ही ऋक् निष्पन्न होती है अथवा वाणीका पालन करनेके कारण यह उसका

१. जठराग्निद्वारा प्रेरित जो शरीरान्तर्गत प्राणवायु है वही ऊपरकी ओर जाकर कण्ठादिसे आहत हो वर्णोंके रूपमें अभिव्यक्त होता है। देवताधिकरणमें वाक्‌को प्राणात्मिका ही निश्चित किया गया है और ऋक् वागात्मिका बतलायी गयी है इसलिये उसका प्राणमें अन्तर्गत होना उचित ही है।