भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 148
१४२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| हि पाल्यते वाक् । अप्राणस्य शब्दोच्चारणसामर्थ्याभावात् । तस्मादु बृहस्पतिर्ऋचां प्राण आत्मेत्यर्थः ॥ २० ॥ | पति है। प्राणसे ही वाणीका पालन होता है, क्योंकि प्राणहीनको शब्दोच्चारणकी शक्ति नहीं होती। अतः यह बृहस्पति यानी ऋचाओंका प्राण अर्थात् आत्मा है ॥२०॥ |


प्राणके ब्रह्मणस्पतित्वकी उपपत्ति

तथा यजुषाम् । कथम् ?इसी प्रकार यह यजुर्मन्त्रोंका भी आत्मा है। किस प्रकार ?

एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः ॥ २१ ॥

यह ही ब्रह्मणस्पति है। वाक् ही ब्रह्म है, उसका यह पति है, इसलिये यह ब्रह्मणस्पति है ॥ २१ ॥

एष उ एव ब्रह्मणस्पतिः । वाग्वै ब्रह्म, ब्रह्म यजुः, तच्च वाग्विषेष एव । तस्या वाचो यजुषो ब्रह्मण एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः पूर्ववत् ।<br><br>कथं पुनरेतदवगम्यते बृहतीब्रह्मणोर्ऋग्यजुष्ट्वं न पुनरन्यार्थत्वम् ? इत्युच्यते—वाचोऽन्ते सामसामानाधिकरण्यनिर्देशात् “वाग्वै साम” (१।३।२२) इति ।यह ही ब्रह्मणस्पति है। वाक् ही ब्रह्म है। ब्रह्म अर्थात् यजुः है, क्योंकि वह भी एक प्रकारकी वाणी ही है। उस वाक्—यजुः यानी ब्रह्मका यह पति है; इसलिये पूर्ववत् यह ब्रह्मणस्पति है।<br><br>किंतु यह कैसे जाना जाता है कि बृहती और ब्रह्म क्रमशः ऋक् और यजुःके ही वाचक हैं, इनका कोई दूसरा अर्थ नहीं है ? इसपर कहा जाता है—अन्तमें [ अर्थात् आगे चलकर ] “वाग्वै साम” इस वाक्यद्वारा वाणीका सामके साथ सामानाधिकरण्य दिखलाया है।