भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 149

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे १४३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तथा च 'वाग्वै बृहती' 'वाग्वै ब्रह्म' इति च वाक्समानाधिकरणयोरृग्यजुष्ट्वं युक्तम् ।उसीके समान 'वाग्वै बृहती' 'वाग्वै ब्रह्म' इन वाक्योंमें जो वाक्के समानाधिकरण [बृहती और ब्रह्म] हैं उसका ऋक् और यजुः होना उचित ही है।
परिशेषाच्च—साम्नि अभिहिते ऋग्यजुषी एव परिशिष्टे । वाग्विशेषत्वाच्च—वाग्विशेषौ हि ऋग्यजुषौ । तस्मात् तयोर्वाचा समानाधिकरणता युक्ता ।यही बात परिशेषसे भी सिद्ध होती है—सामके कह देनेपर ऋक् और यजुः ही परिशिष्ट (शेष) रहते हैं। तथा वाग्विशेष होनेसे भी यही बात मालूम होती है—ऋक् और यजुः ये वाग्विशेष ही हैं। अतः वाणीके साथ उन दोनोंका समानाधिकरण होना उचित ही है।
अविशेषप्रसङ्गाच्च—सामोद्गीथ इति च स्पष्टं विशेषाभिधानत्वम्, तथा बृहतीब्रह्मशब्दयोरपि विशेषाभिधानत्वं युक्तम् । अन्यथा ऽनिर्धारितविशेषयोरानर्थक्यापत्तेश्च विशेषाभिधानस्य वाङ्मात्रत्वे चोभयत्र पौनरुक्त्यात् ।<br><br>ऋग्यजुःसामोद्गीथशब्दानां च श्रुतिष्वेवंक्रमदर्शनात् ॥ २१ ॥इसके सिवा [बृहती और ब्रह्मका रूढ अर्थ लेनेसे] अविशेषका प्रसङ्ग होगा। [आगे] साम और उद्गीथ कहकर स्पष्टतया विशेषका उल्लेख किया है, उसी प्रकार बृहती और ब्रह्म शब्दोंका भी विशेष अर्थ बतलाना आवश्यक है। अन्यथा विशेषका निश्चय न होनेसे उनकी निरर्थकता ही सिद्ध होगी। यदि उनका विशेष वाक् ही बतलाया जाय तो दोनों जगह पुनरुक्तिका प्रसङ्ग होगा। तथा ऋक्, यजुः, साम और उद्गीथ—इन शब्दोंका श्रुतियोंमें ऐसा ही क्रम देखा गया है। [इसलिये बृहती और ब्रह्म शब्द क्रमशः ऋक् और यजुःके ही वाचक हैं] ॥२१॥