भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 181

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७५


प्रजापतिसे मिथुनकी उत्पत्ति

इतश्च संसारविषय एव प्रजापतित्वम्, यतः।प्रजापतित्व इसलिये भी संसारका ही विषय है, क्योंकि—

स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत्। स हैतावानास यथा स्त्रीपुमाँसौ सम्परिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वेधापातयत्ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यस्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव ताँ समभवत्ततो मनुष्या अजायन्त ॥ ३ ॥

वह रममाण नहीं हुआ। इसीसे एकाकी पुरुष रममाण नहीं होता। उसने दूसरेकी इच्छा की। वह जिस प्रकार परस्पर आलिङ्गित स्त्री और पुरुष होते हैं वैसे ही परिमाणवाला हो गया। उसने इस अपने देहको ही दो भागोंमें विभक्त कर डाला। उससे पति और पत्नी हुए। इसलिये यह शरीर अर्द्धबृगल (द्विदल अन्नके एक दल) के समान है—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। इसलिये यह [पुरुषाद्धं] आकाश स्त्रीसे पूर्ण होता है। वह उस (स्त्री) से संयुक्त हुआ; उसीसे मनुष्य उत्पन्न हुए हैं ॥ ३ ॥

स प्रजापतिर्वै नैव रेमे रतिं नान्वभवत्, अरत्याविष्टोऽभूदित्यर्थः, अस्मदादिवदेव यतः, इदानीमपि तस्मादेकाकित्वादिधर्मवत्त्वादेकाकी न रमते रतिं नानुभवति। रतिर्नामेष्टार्थसंयोगजावह प्रजापति रममाण नहीं हुआ—उसने रतिका अनुभव नहीं किया अर्थात् वह हमारे ही समान अरतिसे भर गया। क्योंकि ऐसा हुआ इसलिये इस समय भी एकाकित्वादि धर्मवान् होनेसे पुरुष अकेलेमें नहीं रमता—रतिका अनुभव नहीं करता। इष्टविषयके संयोगसे