भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 182
१७६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
क्रीडा, तत्प्रसङ्गिन इष्टवियोगा-<br>न्मनस्याकुलीभावोऽरतिरित्युच्यते।होनेवाली क्रीडाका नाम रति है, उसमें आसक्त पुरुषके मनसे इष्ट वस्तुका वियोग होनेपर जो व्याकुलता होती है उसे अरति कहते हैं।
स तस्या अरतेरपनोदाय द्विती-<br>यम् अरत्यपघातसमर्थं स्त्रीवस्त्वै-<br>च्छद्गृद्धिमकरोत्। तस्य चैवं<br>स्त्रीविषयं गृध्यतः स्त्रिया परि-<br>ष्वक्तस्येवात्मनो भावो बभूव।<br>स तेन सत्येप्सुत्वाद् एतावानेत-<br>त्परिमाण आस बभूव ह।उस अरतिकी निवृत्तिके लिये उसने अरतिका नाश करनेमें समर्थ दूसरी वस्तु—स्त्रीकी इच्छा यानी अभिलाषा की। इस प्रकार स्त्री-विषयक इच्छा करनेपर उसे अपने देहका स्त्रीसे आलिङ्गित हुएके समान भाव हो गया। सत्यसंकल्प होनेके कारण वह उस भावसे इतना अर्थात् ऐसे ही परिमाणवाला हो गया।
किंपरिमाणः ? इत्याह—यथा<br>लोके स्त्रीपुमांसौ अरत्यपनोदाय<br>सम्परिष्वक्तौ यत्परिमाणौ स्यातां<br>तथा तत्परिमाणौ बभूवेत्यर्थः।किस परिमाणवाला हो गया ?<br>सो श्रुति बतलाती है—जिस प्रकार लोकमें स्त्री और पुरुष अरतिकी निवृत्तिके लिये परस्पर आलिङ्गित होते हैं, वे जिस परिमाणवाले होते हैं उसी परिमाणवाला वह हो गया—ऐसा इसका तात्पर्य है।
स तथा तत्परिमाणमेव इममात्मानं<br>द्वेधा द्विप्रकारमपातयत्पातितवान्<br>इममेवेत्यवधारणं मूलकारणाद्वि-<br>राजो विशेषणार्थम्। न क्षीरस्य<br>सर्वोपमर्देन दधिभावापत्तिवद्विराट्<br>सर्वोपमर्देनैतावानास; किंउसने वैसे—उस परिमाणवाले अपने इस देहको ही द्वेधा-दो प्रकारसे पतित किया। 'इमम् एव' (इस देहको ही) इस प्रकार निश्चय करना मूल कारणसे विराट्की विशेषता बतलानेके लिये है। दूधके सारे स्वरूपका नाश करके होनेवाली दधिभावकी प्राप्तिके समान विराट् अपने पूर्ववर्ती सारे स्वरूपका
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