बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 183, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१७७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तर्हि ? आत्मना व्यवस्थितस्यैव विराजः सत्यसंकल्पत्वादात्मव्यतिरिक्तं स्त्रीपुंसपरिष्वक्तपरिमाणं शरीरान्तरं बभूव । स एव च विराट् तथाभूतः स हैतावानासेति सामानाधिकरण्यात् । | तिरोभाव करके ऐसा नहीं हुआ ? तो फिर किस प्रकार हुआ। अपने स्वरूपमें स्थित रहते हुए ही विराट्-के सत्यसंकल्प होनेके कारण उसके उस शरीरसे भिन्न परस्पर आलिङ्गित हुए स्त्री-पुरुषोंके परिमाणवाला एक देहान्तर हो गया; क्योंकि वही पूर्वरूपमें स्थित विराट् था और वही ऐसा हो गया—इस प्रकार यहाँ [ विराट्के वाचक ] ‘स’ का ‘एतावान्’ से सामानाधिकरण्य है। |
| ततस्तस्मात्पातनात्पतिश्च पत्नी चाभवतामिति दम्पत्योर्निर्वचनं लौकिकयोः । अत एव तस्मात्, यस्मादात्मन एवार्धः पृथग्भूतो येयं स्त्री, तस्मादिदं शरीरमात्मनोऽर्धवृगलमर्धं च तद् वृगलं विदलं च तदर्धवृगलम् अर्धविदल-मिवेत्यर्थः । प्राक्स्त्र्युद्वहनात्कस्यार्धवृगलम् ? इत्युच्यते—स्व आत्मन इति । एवमाह स्मोक्तवान्किल याज्ञवल्क्यः, यज्ञस्य वल्को वक्ता यज्ञवल्कस्तस्यापत्यं याज्ञवल्क्यो दैवरातिरित्यर्थः । ब्रह्मणो वापत्यम् । | उससे—उस द्विधा पातनसे पति और पत्नी हुए—यह लौकिक पति-पत्नियों [ के पति-पत्नी नाम ] का निर्वचन किया गया है। इसीसे, क्योंकि यह जो स्त्री है शरीरका ही पृथग्भूत अर्धभाग है, इसलिये यह शरीर आत्माका अर्धबृगल है। जो अर्ध ( आधा ) हो और बृगल—विदल हो उसे अर्धबृगल (दो दलोंमेंसे एक दल) कहते हैं अर्थात्—अर्धविदल-सा है। किंतु स्त्रीसे विवाह करनेसे पूर्व यह किसका अर्धबृगल होता है, सो श्रुति बतलाती है—स्व अर्थात् अपना ही—ऐसा निश्चय ही याज्ञवल्क्यने कहा है। यज्ञका वल्क—वक्ता यज्ञवल्क कहलाता है, उसका पुत्र याज्ञवल्क्य अर्थात् दैवराति अथवा ब्रह्माका पुत्र याज्ञवल्क्य। |
बृ० उ० १२—