बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| यस्मादयं पुरुषार्ध आकाशः स्त्र्यर्थशून्यः पुनरुद्वहनात्तस्मात्पूर्यते स्त्र्यर्थेन, पुनः सम्पुटीकरणेनेव विदलार्थः । तां स प्रजापतिर्मन्वाख्यः शतरूपाख्यामात्मनो दुहितरं पत्नीत्वेन कल्पितां समभवन्मैथुनमुपगतवान् । ततस्तस्मात्तदुपगमनाद् मनुष्या अजायन्तोत्पन्नाः ॥३॥ | क्योंकि यह पुरुषार्ध आकाश स्त्र्यर्थसे शून्य है, इसलिये पुनः विवाह करनेपर यह स्त्र्यर्थसे पूर्ण होता है, जिस प्रकार कि विदलार्ध पुनः सम्पुटित कर दिये जानेपर । तब वह मनुसंज्ञक प्रजापति अपनी पत्नीरूप कल्पना की हुई उस अपनी ही शतरूपा नामकी कन्यासे संयुक्त हुआ अर्थात् मैथुनधर्ममें प्रवृत्त हुआ । उस मैथुनकी प्रवृत्तिसे मनुष्य उत्पन्न हुए ॥ ३ ॥ |
मिथुनके द्वारा गवादि प्रपञ्चकी सृष्टि
सो हेयमीक्षाञ्चक्रे कथं नु मात्मन एव जनयित्वा सम्भवति हन्त तिरोऽसानीति सा गौरभवदृषभ इतरस्ताꣳ समेवाभवत्ततो गावोऽजायन्त वडवेतराभवदश्ववृष इतरो गर्दभीतरा गर्दभ इतरस्ताꣳ समेवाभवत्तत एकशफमजायताजेतराभवद्बस्त इतरोऽविरितरा मेष इतरस्ताꣳ समेवाभवत्ततोऽजावयोऽजायन्तैवमेव यदिदं किञ्च मिथुनमा पिपीलिकाभ्यस्तत्सर्वमसृजत ॥४॥
उस [ शतरूपा ] ने यह विचार किया कि 'अपनेहीसे उत्पन्न करके यह मुझसे क्यों समागम करता है ? अच्छा, मैं छिप जाऊँ, अतः वह गौ हो गयी, तो दूसरा यानी मनु वृषभ होकर उससे सम्भोग करने लगा, इससे गाय-बैल उत्पन्न हुए । तब वह घोड़ी हो गयी और मनु अश्वश्रेष्ठ हो गया, फिर वह गर्दभी हो गयी और मनु गर्दभ हों गया और उससे