बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 185, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७६
सम्भोग करने लगा । इससे एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए । तदनन्तर शतरूपा बकरी हो गयी और मनु बकरा हो गया । फिर वह भेड़ हो गयी और मनु भेड़ा होकर उससे समागम करने लगा । इससे बकरी और भेड़ोंकी उत्पत्ति हुई । इसी प्रकार चींटीसे लेकर ये जितने मिथुन (स्त्री-पुरुष-रूप जोड़े) हैं उन सभीकी उन्होंने रचना कर डाली ॥ ४ ॥
| सा शतरूपा उ ह इयं सेयं दुहितृगमने स्मार्तं प्रतिषेधमनुस्मरन्तीक्षाञ्चक्रे । कथं न्विदमकृत्यं यन्मा मामात्मन एव जनयित्वोत्पाद्य सम्भवत्युपगच्छति । यद्यप्ययं निर्घृणोऽहं हन्तेदानीं तिरोऽसानि जात्यन्तरेण तिरस्कृता भवानि । इत्येवमीक्षित्वासौ गौरभवत् । उत्पाद्यप्राणिकर्म्मभिश्चोद्यमानायाः पुनःपुनः सैव मतिः शतरूपाया मनोश्चाभवत् । ततश्च ऋषभ इतरः । तां समेवाभवदित्यादि पूर्ववत् । ततो गावोऽजायन्त ।<br><br>तथा वडवेतराभवदश्ववृष इतरः । तथा गर्दभीतरा गर्दभ इतरः । तत्र वडवाश्ववृषादीनां सङ्गमात्तत एकशफमेकखुरमश्वाश्वतरगर्दभाख्यं त्रयमजायत । | वह यह शतरूपा स्मृतिके कन्यागमनसम्बन्धी प्रतिषेधवाक्यको स्मरण कर यह विचार करने लगी । यह ऐसा अकरणीय कार्य क्यों करता है जो मुझे अपनेहीसे उत्पन्नकर मेरे साथ सम्भोग करता है । यद्यपि यह तो निर्दय है तथापि मैं अब छिप जाती हूँ—जात्यन्तररूपसे अपनेको छिपाये लेती हूँ । ऐसा विचारकर वह गौ हो गयी । किंतु उत्पन्न किये जाने योग्य प्राणियोंके कर्मोंसे प्रेरित हुई शतरूपाकी और मनुकी भी पुनःपुनः वैसी ही मति होती रही । अतः मनु वृषभ हो गया और पूर्ववत् उसके साथ समागम करने लगा । उससे गाय-बैल उत्पन्न हुए ।<br><br>फिर शतरूपा घोड़ी हो गयी और मनु अश्वश्रेष्ठ तथा उसके पश्चात् वह गर्दभी हो गयी और मनु गर्दभ । तब उन घोड़ी और अश्वश्रेष्ठादिके समागमसे घोड़ा, खच्चर और गधा—ये तीन एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए । |
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