बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| तथा अजेतराभवद्वस्त इतरश्छाग इतरः, तथाऽविरितरा मेष इतरः, तां समेवाभवत् । तां तामिति वीप्सा । तामजां तामविं चेतिसमभवदेवेत्यर्थः । ततोऽजाश्वावयश्चाजावयोऽजायन्त । एवमेव यदिदं किञ्च यत्किञ्चेदं मिथुनं स्त्रीपुंसलक्षणं द्वन्द्वम्, आ पिपीलिकाभ्यः पिपीलिकाभिः सहानेनैव न्यायेन तत्सर्वमसृजत जगत्सृष्टवान् ॥ ४ ॥ | इसी प्रकार शतरूपा बकरी हो गयी और मनु बकरा तथा वह भेड़ हो गयी और मनु भेड़ा हो गया और उससे समागम करने लगा । यहाँ 'ताम्' शब्दकी 'तां ताम्' ऐसी द्विरुक्ति समझनी चाहिये अर्थात् उस बकरीसे और उस भेड़से समागम करने लगा। तब भेड़-बकरियोंकी उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार आपिपीलिकाभ्यः—चींटीसे लेकर ये जो कुछ भी मिथुन—स्त्री-पुरुषरूप जोड़े हैं, उसने इसी न्यायसे इन सबकी रचना की, अर्थात् इस सारे जगत्को उत्पन्न किया ॥ ४ ॥ |
प्रजापतिकी सृष्टिसंज्ञा और सृष्टिरूपसे उसकी उपासना करनेका फल
सोऽवेदहं वाव सृष्टि॒रस्म्यहँ॒ हीदँ॒ सर्व॑मसृक्षीति ततः सृष्टि॑रभवत्सृ॒ष्ट्याँ॒ हास्यै॒तस्यां॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ ५ ॥
उस प्रजापतिने 'मैं ही सृष्टि हूँ' ऐसा जाना। मैंने इस सबको रचा है। इस कारण वह 'सष्टि' नामवाला हुआ। जो ऐसा जानता है वह इस (प्रजापति) की इस सृष्टिमें [स्रष्टा] होता है ॥ ५ ॥
| स प्रजापतिः सर्वमिदं जगत्सृष्ट्वा अवेत् । कथम्? अहं वावाहमेव सृष्टिः, सृज्यते इति सृष्टं जगदुच्यते सृष्टिरिति । यन्मया | उस प्रजापतिने इस सम्पूर्ण जगत्को रचकर जाना। किस प्रकार जाना ? 'मैं ही सृष्टि हूँ।' उसका सर्जन (निर्माण) किया जाता है, इसलिये वह सृष्ट (उत्पन्न) हुआ जगत् सृष्टि कहलाता है। [उसने विचार किया—] 'मेरेद्वारा |