भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 187

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १८१


सृष्टं जगन्मदभेदत्वादहमेवास्मि न मत्तो व्यतिरिच्यते । कुत एतत् ? अहं हि यस्मादिदं सर्वं जगदसृक्षि सृष्टवानस्मि तस्मादित्यर्थः ।जो जगत् रचा गया है वह मुझसे अभिन्न होनेके कारण मैं ही हूँ, वह मुझसे अलग नहीं है। ऐसा क्यों है ? क्योंकि मैंने ही इस सम्पूर्ण जगत्को रचा है, इसलिये'—[ यह मुझसे अभिन्न है ] ऐसा इसका तात्पर्य है।
यस्मात्सृष्टिशब्देन आत्मानमेवाभ्यधातप्रजापतिः, ततस्तस्मात्सृष्टिरभवत् सृष्टिनामाभवत् । सृष्ट्यां जगति, हास्य प्रजापतेरेतस्यामेतस्मिञ्जगति, स प्रजापतिवत्स्रष्टा भवति स्वात्मनोऽनन्यभूतस्य जगतः, कः ? य एवं प्रजापतिवद्यथोक्तं स्वात्मनोऽनन्यभूतं जगत्साध्यात्मदिभूताधिदैवं जगदहमस्मीति वेद ॥५॥क्योंकि प्रजापतिने 'सृष्टि' नामसे अपनेको ही कहा था, इसलिये वह सृष्टि अर्थात् सृष्टि नामवाला हुआ । इस प्रजापतिकी सृष्टिमें अर्थात् इस जगत्में वह प्रजापतिके समान अपनेसे अनन्यभूत जगत्का स्रष्टा होता है; कौन ? जो इस प्रकार प्रजापतिके समान उपर्युक्त अपनेसे अभिन्न जगत्को, 'अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवके सहित सारा जगत् मैं हूँ' इस प्रकार जानता है ॥ ५ ॥

प्रजापतिकी अग्न्यादिदेवरूप अतिसृष्टि

अथेत्यभ्यमन्थत्स मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निममसृजत तस्मादेतदुभयमलोमकमन्तरतोऽलोमका हि योनिरन्तरतः । तद्यदिदमाहुरमुं यजामुं यजेत्येकैकं देवमेतस्यैव सा विसृष्टिरेष उ ह्येव सर्वे देवाः । अथ यत्किञ्चेदमार्द्रं तद्रेतसोऽसृजत तदु सोम एतावद्वा