बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 191, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८५
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| याज्ञिका यागकाले यदिदं वच आहुः—'अमुमग्निं यजामुमिन्द्रं यज' इत्यादि—नामशस्त्रस्तोत्रकर्मादिभिन्नत्वाद्छिन्नमेवाग्न्यादिदेवमेकैकं मन्यमाना आहुरित्यभिप्रायः। तन्न तथा विद्यात्, यस्मादेतस्यैव प्रजापतेः सा विसृष्टिर्देवभेदः सर्व एष उ ह्येव प्रजापतिरेव प्राणः सर्वे देवाः। | याज्ञिकलोग यज्ञके समय जो अग्नि आदि देवताओंमेंसे प्रत्येकके नाम, शस्त्र, स्तोत्र और कर्म भिन्न-भिन्न होनेके कारण एक-एकको अलग-अलग मानते हुए ऐसा वचन बोलते हैं कि 'इस अग्निका यजन करो, इस इन्द्रका यजन करो' उसे उस रूपमें (ठीक) नहीं समझना चाहिये; क्योंकि यह सम्पूर्ण विसृष्टि-देवभेद इस प्रजापतिका ही है, अतः प्राणरूप प्रजापति ही सर्वदेव है। |
| अत्र विप्रतिपद्यन्ते—पर एव हिरण्यगर्भ इत्येके। संसारीत्यपरे। | इस विषयमें विद्वानोंका मतभेद है—किन्हींका तो कथन है कि परमात्मा ही हिरण्यगर्भ है और कोई कहते हैं कि वह संसारी है। |
| पर एव तु मन्त्रवर्णात्। "इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुः" इति श्रुतेः। "एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवाः" (ऐ० उ० ५।३) इति च श्रुतेः। स्मृतेश्च— "एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम्" (मनु० १२।१२३) इति, "योऽसावतीन्द्रियोऽग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः। सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एव स्वयमुद्बभौ"। (मनु० १।७) इति च। | प्रथम पक्ष—मन्त्राक्षरोंसे सिद्ध होनेके कारण परमात्मा ही हिरण्यगर्भ है। "उसे इन्द्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं" इस श्रुतिसे तथा "यह ब्रह्मा है, यह इन्द्र है, यह प्रजापति (विराट्) है और यह सम्पूर्ण देवगण है" इस श्रुतिसे, एवं "इस परमात्माको कोई अग्नि, कोई मनु और कोई प्रजापति कहते हैं", "यह जो अतीन्द्रिय, अग्राद्य, सूक्ष्म, अव्यक्त, सनातन, सर्वभूतमय और अचिन्त्य परमात्मा है वही स्वयं प्रकट हुआ" इन स्मृतियोंसे यही सिद्ध होता है। |