बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| संसार्येव वा स्यात्। "सर्वान्पाप्मन औषत्" (बृ० उ० १। ४। १) इति श्रुतेः। न ह्यसंसारिणः पाप्मदाहप्रसङ्गोऽस्ति। भयारतिसंयोगश्रवणाच्च। "अथ यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत" (बृ० उ० १। ४। ६) इति च। "हिरण्यगर्भं पश्यति जायमानम्" (श्वे० उ० ४। १२) इति च मन्त्रवर्णात्। स्मृतेश्च कर्मविपाकप्रक्रियायाम्—"ब्रह्मा विश्वसृजो धर्मो महानव्यक्तमेव च। उत्तमां सात्त्विकीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः" (मनु० १२। ५०) इति। | द्वितीय पक्ष—अथवा संसारी ही हिरण्यगर्भ होना चाहिये, जैसा कि "उसने समस्त पापोंको दग्ध कर दिया" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है, क्योंकि असंसारी परमात्माके लिये तो पापदाहका प्रसंग ही नहीं है। इसके सिवा उसका भय और अरतिके साथ संयोग भी सुना गया है; यहाँ यह भी कहा है कि "उसने स्वयं मर्त्य होकर भी अमृतों (देवताओं) की रचना की।" तथा "उसने उत्पन्न होनेवाले हिरण्यगर्भको देखा" इस मन्त्रवर्णसे भी यही सिद्ध होता है। और कर्मविपाक-प्रक्रियामें "ब्रह्मा (हिरण्यगर्भ), प्रजापतिगण, धर्म, महत्तत्त्व और अव्यक्त—इन्हें मनीषीगण उत्तम सात्त्विकी गति बतलाते हैं" इत्यादि स्मृति भी है। | | अथैवं विरुद्धार्थानुपपत्तेः प्रामाण्यव्याघात इति चेत् ? | शङ्का—किंतु इस प्रकार विरुद्ध अर्थ तो संगत नहीं हो सकता। इसलिये इससे श्रुतिके प्रामाण्यका विघात होता है। | | न, कल्पनान्तरोपपत्तेरविरोधात्। | समाधान—ऐसा मत कहो, क्योंकि एक अन्य कल्पना सम्भव होनेके कारण इनमें अविरोध हो सकता है। | | उपाधिविशेषसम्बन्धाद्विशेषकल्पनान्तरमुपपद्यते। "आसीनो दूरं | उपाधिविशेषके सम्बन्धसे एक विशेष प्रकारकी कल्पना होनी सम्भव है। "वह स्थिर होने- |