बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 193, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 193
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८७
| व्रजति शयानो याति सर्वतः ।<br>कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातु-<br>मर्हति" (क०उ० १।२।२१)<br>इत्येवमादिश्रुतिभ्य उपाधिवशा-<br>त्संसारित्वं न परमार्थतः। स्वतो-<br>ऽसंसार्येव । | पर भी दूर चला जाता है, शयन<br>किये होनेपर भी सब ओर जाता है,<br>उस हर्ष और विषादयुक्त देवको मेरे<br>सिवा और कौन जान सकता है ?"<br>इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार उसका<br>उपाधिके ही कारण संसारित्व है,<br>परमार्थतः नहीं। स्वतः तो वह<br>असंसारी ही है। |
| एवमेकत्वं नानात्वं च हिर-<br>ण्यगर्भस्य । तथा सर्वजीवानाम्,<br>"तत्त्वमसि" (छा० उ० ६।८-<br>१६) इति श्रुतेः । हिरण्यगर्भ-<br>स्तु उपाधिशुद्धयतिशयापेक्षया<br>प्रायशः पर एवेति श्रुतिस्मृति-<br>वादाः प्रवृत्ताः । संसारित्वं तु<br>क्वचिदेव दर्शयन्ति । जीवानां<br>उपाधिगताशुद्धिबाहुल्यात्संसा-<br>रित्वमेव प्रायशोऽभिलप्यते ।<br>व्यावृत्तकृत्स्नोपाधिभेदापेक्षया तु<br>सर्वः परत्वेनाभिधीयते श्रुति-<br>स्मृतिवादैः । | इस प्रकार हिरण्यगर्भका एकत्व<br>भी है और नानात्व भी। इसी<br>तरह सब जीवोंका भी एकत्व और<br>नानात्व है, जैसा कि "तू वह है"<br>इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। हिरण्य-<br>गर्भ तो उपाधिकी शुद्धिकी अति-<br>शयताकी अपेक्षासे प्रायः परमात्मा<br>ही है—ऐसी श्रुति-स्मृतिवादोंकी<br>प्रवृत्ति है। वे उसका संसारित्व<br>तो कहीं-कहीं ही दिखाते हैं। किंतु<br>जीवोंका तो उपाधिगत अशुद्धिकी<br>अधिकताके कारण प्रायः संसारित्व<br>ही बतलाया जाता है। तथा<br>सम्पूर्ण उपाधिभेदके बाधकी अपेक्षा-<br>से श्रुति और स्मृतिके वादोंद्वारा<br>सबका परमात्मभावसे निरूपण<br>किया जाता है। |
| तार्किकैस्तु परित्यक्तागमबलै-<br>रस्ति नास्ति कर्ताकर्तेत्यादि | जो शास्त्रका बल छोड़ चुके हैं<br>तथा 'आत्मा है—नहीं है, वह<br>कर्ता है—अकर्ता है' इस प्रकार |