भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 195

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१८९


संस्कृत-भाष्यम्भाष्यार्थ
कम्। अन्नादश्चाग्निरौष्ण्याद् रूक्षत्वाच्च। तत्रैवमवध्रियते, सोम एवान्नं यद्यते तदेव सोम इत्यर्थः। य एवात्ता स एवाग्निः; अर्थबलाद्ध्यवधारणम्। अग्निरपि क्वचिद् हूयमानः सोमपक्षस्यैव। सोमोऽपीज्यमानोऽग्निरेवात्तृत्वात्। एवमग्नीषोमात्मकं जगदात्मत्वेन पश्यन्न केनचिद्दोषेण लिप्यते, प्रजापतिश्च भवति।सोम पोषक अन्न है और उष्णता तथा रूक्षताके कारण अग्नि अन्नाद है। यहाँ यह निश्चय होता है कि सोम ही अन्न है, अर्थात् जो भक्षण किया जाता है वही सोम है। इसी प्रकार जो ही अत्ता (भक्षण करनेवाला) है वही अग्नि है, अर्थके बलसे ही ऐसा निश्चय किया जाता है। कहीं हवन किया जानेवाला होनेसे अग्नि भी सोमपक्षका ही हो जाता है और कहीं यजन किया जानेवाला होनेपर अत्ता होनेके कारण सोम भी अग्नि ही माना जाता है। इस प्रकार अग्नीषोमात्मक जगत्‌को आत्मभावसे देखनेवाला पुरुष किसी भी दोषसे लिप्त नहीं होता तथा वह प्रजापति हो जाता है।
सैषा ब्रह्मणः प्रजापतेरतिसृष्टिरात्मनोऽप्यतिशया। का सा? इत्याह—यच्छ्रेयसः प्रशस्यतरान्नात्मनः सकाशाद्यस्मादसृजत देवांस्तस्माद्देवसृष्टिरतिसृष्टिः। कथं पुनरात्मनोऽतिशया सृष्टिः? इत्यत आह—अथ यद्यस्मान्मर्त्यः सन्मरणधर्मा सन्नमृतानमरण-वह यह प्रजापति ब्रह्माकी अतिसृष्टि अर्थात् अपनेसे भी बढ़ी हुई सृष्टि है। वह क्या है? इसपर श्रुति कहती है—क्योंकि प्रजापतिने देवताओंको अपनी अपेक्षा श्रेयसः—प्रशस्यतर रचा है, इसलिये देवसृष्टि अतिसृष्टि है। [प्रजापतिकी] यह सृष्टि अपनी अपेक्षा बढ़कर क्यों है? इसपर श्रुति कहती है—क्योंकि इसने स्वयं मर्त्य--मरणधर्मा होनेपर