भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 196
१९०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| धर्मिणो देवान् कर्मज्ञानवह्निना सर्वान्पाप्मन ओषित्वाऽसृजत, तस्मादियमतिसृष्टिरुत्कृष्टज्ञानस्य फलमित्यर्थः । तस्मादेतामतिसृष्टिं प्रजापतेरात्मभूतां यो वेद स एतस्यामतिसृष्ट्यां प्रजापतिरिव भवति प्रजापतिवदेव स्रष्टा भवति ॥ ६ ॥ | भी कर्मज्ञानरूप अग्निसे अपने समस्त पापोंको दग्धकर इन अमृत—अमरणधर्मा देवताओंकी रचना की है। इसलिये यह अतिसृष्टि अर्थात् उत्कृष्ट ज्ञानका फल है। इसलिये प्रजापतिकी आत्मभूता इस अतिसृष्टिको जो जानता है वह इस अतिसृष्टिमें प्रजापतिके समान होता है, अर्थात् प्रजापतिके समान ही जगत्का स्रष्टा होता है ॥ ६ ॥ |


अव्याकृत कारण ब्रह्मसे व्यक्त जगत्की उत्पत्ति, दोनोंका अभेद और इस अभेदोपासनाका फल

| सर्वं वैदिकं साधनं ज्ञानकर्मलक्षणं कर्त्राद्यनेककारकापेक्षं प्रजापतित्वफलावसानं साध्यमेतावदेव यदेतद्व्याकृतं जगत्संसारः । अथैतस्यैव साध्यसाधनलक्षणस्य व्याकृतस्य जगतो व्याकरणात्प्राग्बीजावस्था या तां निर्दिदिक्षत्यङ्कुरादिकार्यानुमितामिव वृक्षस्य, कर्मबीजोऽविद्याक्षेत्रो ह्यसौ संसारवृक्षः समूल उद्धर्तव्य इति । | कर्तादि अनेक कारकोंकी अपेक्षावाला ज्ञान और कर्मरूप सम्पूर्ण वैदिक साधन तथा प्रजापतित्वरूप फलमें समाप्त होनेवाला साध्य इतना ही है जो कि यह व्याकृत जगत् यानी संसार है। अब, जिसका बीज कर्म है और क्षेत्र अविद्या है उस संसारवृक्षको समूल उखाड़ना है—इसलिये अङ्कुरादि कार्यसे अनुमित होनेवाली वृक्षकी पूर्व बीजावस्थाके समान इस साध्यसाधनरूप व्याकृत जगत्के व्याकृत होनेसे पूर्व इसकी जो बीजावस्था थी उसका श्रुति निर्देश करना चाहती है; क्योंकि |