बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 202, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| तथा अपरित्यक्तान्यतमविशेषवदेव तद्व्याकृतम्। व्याकृताव्याकृतमात्रं तु विशेषः। | अव्याकृत भी उनमेंसे किसी विशेषका त्याग न करके उनसे युक्त ही है। उनमें व्याकृत और अव्याकृत होनेका ही अन्तर है। | | दृष्टश्च लोके विवक्षातः शब्दप्रयोगो ग्राम आगतो ग्रामः शून्य इति । कदाचिद् ग्रामशब्देन निवासमात्रविवक्षायां ग्रामः शून्य इति शब्दप्रयोगो भवति, कदाचिन्नितवासिजनविवक्षायां ग्राम आगत इति, कदाचिदुभयविवक्षायामपि ग्रामशब्दप्रयोगो भवति ग्रामं च न प्रविशेदिति यथा । तद्वदिहापि जगदिदं व्याकृतमव्याकृतं चेत्यभेदविवक्षायाम् आत्मानात्मनोर्भवति व्यपदेशः । तथेद्ं जगदुत्पत्तिविनाशात्मकमिति केवलजगद्व्यपदेशः। तथा “महानज आत्मा” (बृ० उ० ४ । ४ । २२) “अस्थूलोऽनणुः” “स एष नेति नेति” (बृ० उ० ३ । ९ । २६) इत्यादि केवलात्मव्यपदेशः । | लोकमें भी विवक्षाके अनुसार शब्दका प्रयोग होता देखा गया है जैसे ‘गाँव आ गया’, ‘गाँव सूना है’ इन वाक्योंमें कभी तो ‘गाँव’ शब्दसे निवासस्थानमात्र बतलाना अभीष्ट होनेपर ‘गाँव सूना है’ ऐसा शब्द प्रयोग होता है और कभी गाँवमें रहनेवाले लोगोंकी विवक्षासे ‘गाँव आ गया’ ऐसा प्रयोग होता है। तथा कभी दोनोंकी विवक्षासे भी ‘गाँव’ शब्दका प्रयोग होता है जैसे ‘गाँवमें प्रवेश न करे’ इस वाक्यमें। इसी प्रकार यहाँ भी ‘यह जगत् व्याकृत और अव्याकृत है’ इस वाक्यमें अभेदकी विवक्षासे आत्मा और अनात्माका निर्देश हुआ है तथा ‘यह जगत् उत्पत्ति-विनाशात्मक है’ इस वाक्यमें केवल जगत्का व्यपदेश है। इसी तरह “यह महान् अजन्मा आत्मा है”, “यह न स्थूल है, न अणु (सूक्ष्म)”, “वह यह आत्मा ऐसा (कारणरूप) नहीं है, ऐसा (कार्यरूप) नहीं है” इत्यादि श्रुतियोंमें केवल आत्माका व्यपदेश है। |