भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 203

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १९७


ननु परेण व्याकर्त्रा व्याकृतं सर्वतो व्याप्तं सर्वदा जगत्, स कथमिह प्रविष्टः परिकल्प्यते ? अप्रविष्टो हि देशः परिच्छिन्नेन प्रवेष्टुं शक्यते, यथा पुरुषेण ग्रामादिः । नाकाशेन किञ्चिन्नित्यप्रविष्टत्वात् ।**शङ्का—**किंतु जगत्को व्यक्त करनेवाले परमात्माने उसे व्यक्त कर सर्वदा सब ओरसे व्याप्त कर रखा है; फिर 'उसने इसमें प्रवेश किया' ऐसी कल्पना क्यों की जाती है ? किसी परिच्छिन्न पदार्थद्वारा अपनेसे अप्रविष्ट देशमें ही प्रवेश किया जा सकता है, जैसे पुरुषसे ग्रामादि। आकाशके द्वारा किसी भी पदार्थमें प्रवेश नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह तो सबमें नित्य प्रविष्ट ही है।
पाषाणसर्पादिवद्धर्मान्तरेणेति चेत् । अथापि स्यात्, न पर आत्मा स्वेनैव रूपेण प्रविवेश, किं तर्हि ? तत्स्थ एव धर्मान्तरेणोपजायते, तेन प्रविष्ट इत्युपचर्यते । यथा पाषाणे सहजोऽन्तःस्थः सर्पो नालिकेरे वा तोयम् ।**सिद्धान्ती—**किंतु यदि पाषाण और सर्पादिके समान उसने धर्मान्तररूपसे प्रवेश किया हो तो ? अर्थात् ऐसा भी हो सकता है कि परमात्माने अपने ही रूपसे प्रवेश नहीं किया, तो फिर क्या हुआ ? वह उसमें स्थित हुआ ही धर्मान्तररूपसे उत्पन्न हो गया, इसीसे 'उसने प्रवेश किया' ऐसा उपचार होता है, जिस प्रकार कि पत्थरमें उसके भीतर रहनेवाला एवं उसके साथ उत्पन्न हुआ सर्प<sup></sup> अथवा नारियलमें जल।
न, “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” (तै० उ० २ । ६ । १)**पूर्व०—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि “उसे रचकर वह उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया”—ऐसी श्रुति है।

१. पाषाणमें स्थित जो पञ्चमहाभूत हैं उन्हींका परिणाम होनेसे सर्पको सहज (उसके साथ उत्पन्न होनेवाला) कहा है।