बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 229, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 229
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे २२३
| संस्कृत मूल | हिन्दी भाषार्थ |
|---|---|
| “तत्र को मोहः” (ईशा० ७) “विद्वान्न बिभेति कुतश्चन” (तै० उ० २।९।१) “अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि” (बृ० उ० ४।२।४) “भिद्यते हृदयग्रन्थिः” (मु० उ० २।२।८) इत्यादिश्रुतयः । | अवस्थामें क्या मोह है”, “आत्मज्ञानी किसीसे भी भय नहीं मानता”, “हे जनक ! तू निश्चय अभयको प्राप्त हो गया है”, “हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है” इत्यादि श्रुतियाँ प्रमाण हैं। |
| निरोधस्त्वर्थान्तरमिति चेत् ।<br><br>अथापि स्याच्चित्तवृत्तिनिरोधस्य वेदवाक्यजनितात्मविज्ञानादर्थान्तरत्वात्, तन्त्रान्तरेषु च कर्तव्यतयावगतत्वाद्बिधेयत्वमिति चेत् ? | **पूर्व०—**तथापि ज्ञानसे भिन्न निरोध भी तो एक मोक्षका साधन है। तात्पर्य यह है कि वेदवाक्यजनित आत्मविज्ञानसे अर्थान्तर होने और शास्त्रान्तरमें [मोक्षप्राप्तिके लिये] कर्तव्यरूपसे ज्ञात होनेके कारण चित्तवृत्तिनिरोधकी विधेयता तो है ही। |
| न; मोक्षसाधनत्वेनानवगमात्। न हि वेदान्तेषु ब्रह्मात्मविज्ञानाद् अन्यत्परमपुरुषार्थसाधनत्वेनावगम्यते । “आत्मानमेवावेत्” (बृ० उ० १।४।१०) “तस्मात्तत्सर्वमभवत्” (१।४।१०) “ब्रह्मविदाप्नोति परम्” (तै० उ० २।१।१) “स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति” (मु० उ० ३।२।९) “आचार्यवान्पुरुषो वेद” (छा० उ० ६।१४।२) “तस्य ताव- | **सिद्धान्ती—**ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि वह मोक्षके साधनरूपसे नहीं जाना जाता। वेदान्तशास्त्रोंमें ब्रह्मात्मविज्ञानके सिवा अन्य कुछ भी परमपुरुषार्थकी प्राप्तिके साधनरूपसे नहीं जाना जाता; जैसा कि “आत्माको ही जाना”, “अतः वह सर्वरूप हो गया”, “ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता है”, “जो भी उस परब्रह्मको जानता है ब्रह्म ही हो जाता है,” “आचार्यवान् पुरुषको ज्ञान होता है,” |