भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 230, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 230
२२४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| देव चिरम्'' (६। १४। २)<br>''अभयं हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद'' (बृ० उ० ४। ४। २५)<br>इत्येवमादिश्रुतिशतेभ्यः।<br>अनन्यसाधनत्वाच्च निरोधस्य। | ''उसके लिये तभीतक देरी है'',<br>''जो इस प्रकार जानता है अभय ब्रह्म ही हो जाता है'' इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंसे सिद्ध होता है।<br><br>इसके सिवा निरोध भी किसी अन्य साधनसे सिद्ध होनेवाला नहीं | | न ह्यात्मविज्ञानतत्स्मृतिसन्तानव्यतिरेकेण चित्तवृत्तिनिरोधस्य साधनमस्ति। अभ्युपगम्येदमुक्तम्, न तु ब्रह्मविज्ञानव्यतिरेकेण अन्यन्मोक्षसाधनमवगम्यते। | है। अर्थात् आत्मविज्ञान और उसकी स्मृतिके प्रवाहके सिवा चित्तवृत्ति-निरोधका कोई अन्य साधन नहीं है। यह बात भी हम उसे मोक्षका साधन मानकर कहते हैं, वस्तुतः तो ब्रह्मविज्ञानके सिवा मोक्षका कोई दूसरा साधन जाननेमें ही नहीं आता। | | आकाङ्क्षाभावाच्च भावनाभावः। | [अब भावनात्रयका खण्डन करते हैं-] आत्मविज्ञानमें आकाङ्क्षाका अभाव होनेके कारण भावनाका भी अभाव है। | | भावनात्रय-खण्डनम्<br>यदुक्तं यजेतेत्यादौ किं केन कथम् इति भावनाकाङ्क्षायां फलसाधनेतिकर्त्तव्यताभिराकाङ्क्षापनयनं यथा, तद्वदिहाप्यात्मविज्ञानविधावप्युपपद्यत इति; तदसत्, ''एकमेवाद्वितीयम्'' (छा० उ० ६। | तुमने जो कहा कि 'यजेत' इत्यादि विधिमें 'किसका, किसके द्वारा, किस प्रकार [यजन करे],' ऐसी भावनाकी आकाङ्क्षा होनेपर जैसे फल, साधन और इतिकर्त्तव्यताके द्वारा उस आकाङ्क्षाकी निवृत्ति की जाती है उसी प्रकार यहाँ आत्मविज्ञानसम्बन्धी विधिमें भी उसका होना सम्भव है, सो तुम्हारा यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि ''एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म'' |