भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 231

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२६


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
२ । १) “तत्त्वमसि” (छा० उ० ६ । ८—१६) “नेति नेति” (बृ० उ० २ । ३ । ६) “अनन्तरमबाह्यम्” (बृ० उ० २ । ५ । १९) “अयमात्मा ब्रह्म” (२ । ५ । १९) इत्यादिवाक्यार्थविज्ञानसमकालमेव सर्वाकाङ्क्षाविनिवृत्तेः । न च वाक्यार्थविज्ञाने विधिप्रयुक्तः प्रवर्तते विध्यन्तरप्रयुक्तौ चानवस्थादोषमवोचाम । न च “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म” इत्यादिवाक्येषु विधिरवगम्यते । आत्मस्वरूपान्वाख्यानेनैवावसितत्वात् ।“तत्त्वमसि”, “नेति नेति”, “अनन्तरमबाह्यम्” “अयमात्मा ब्रह्म” इत्यादि वाक्योंके अर्थका ज्ञान होते ही सब प्रकारकी आकाङ्क्षाएँ निवृत्त हो जाती हैं । तथा वाक्यार्थके ज्ञानमें पुरुष विधिसे प्रेरित होकर प्रवृत्त नहीं होता । उसमें विध्यन्तरका प्रयोग माननेसे अनवस्था दोष आता है—यह हम ऊपर बतला चुके हैं । इसके सिवा “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म” इत्यादि वाक्योंमें विधि देखी भी नहीं जाती, क्योंकि उनका पर्यवसान तो आत्मस्वरूपके अनुवादमात्रमें ही हो जाता है ।
वस्तुस्वरूपान्वाख्यानमात्रत्वादप्रामाण्यमिति चेत् । अथापि स्याद्यथा “सोऽरोदीद्यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम्” इत्येवमादौ वस्तुस्वरूपान्वाख्यानमात्रत्वादप्रामाण्यम्, एवमात्मार्थवाक्यानामपीति चेत् ?पूर्व०—वस्तुस्वरूपके अनुवादमात्र होनेसे तो उनकी अप्रामाणिकता सिद्ध होती है । अर्थात् जैसे “सोऽरोदीद्यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम्”<sup></sup> इत्यादि वाक्योंमें वस्तुके स्वरूपका अनुवादमात्र होनेसे उनकी प्रामाणिकता नहीं मानी जाती, उसी प्रकार आत्मविषयक वाक्योंकी भी प्रामाणिकता नहीं है—ऐसी बात हो तो ?
न; विशेषात् । न वाक्यस्य वस्त्वन्वाख्यानं क्रियान्वाख्यानंसिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उन अर्थवादवाक्योंसे आत्मार्थवाक्योंकी विशेषता है । वस्तु या क्रियाका अनुवाद ही वाक्यको

१. वह (अग्नि) रोया और वह जो रोया वही उस रुद्रका रुद्रत्व है ।
बृ० उ० १५—