भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 232
२२६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| वा प्रामाण्याप्रामाण्यकारणम्, किं तर्हि? निश्चितफलवद्विज्ञानोत्पादकत्वम्। तद्यत्रास्ति तत्प्रमाणं वाक्यम्, यत्र नास्ति तदप्रमाणम्।<br><br>किञ्च भो पृच्छामस्त्वाम्—आत्मस्वरूपान्वाख्यानपरेषु वाक्येषु फलवन्निश्चितं च विज्ञानमुत्पद्यते, न वा ? उत्पद्यते चेत्कथमप्रामाण्यमिति? किं वा न पश्यसि अविद्याशोकमोहभयादिसंसारबीजदोषनिवृत्तिं विज्ञानफलम्। न शृणोषि वा किम् “तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” (ईशा० ७) “मन्त्रविदेवास्मि नात्मवित्सोऽहं भगवः शोचामि तं मा भगवाञ्छोकस्य पारं तारयतु” (छा० उ० ७।१।३) इत्येवमाद्युपनिषद्वाक्यशतानि ? एवं विद्यते किं सोऽरोदीदित्यादिषु निश्चितं फलवच्च विज्ञानम्। न चेद्विद्यतेऽस्त्वप्रामाण्यम्। तद- | प्रामाणिकताका अथवा अप्रामाणिकताका कारण नहीं है। तो फिर क्या है ? निश्चित फलवाले विज्ञानको उत्पन्न करना। वह जिसमें है वही वाक्य प्रामाणिक है और जिसमें नहीं है वही अप्रामाणिक है।<br><br>सो, भाई ! हम तुमसे यह पूछते हैं कि आत्मस्वरूपका निरूपण करनेवाले वाक्योंसे सफल और निश्चित विज्ञान उत्पन्न होता है या नहीं ? यदि उत्पन्न होता है तो उनकी अप्रामाणिकता कैसे हो सकती है ? क्या तुम उस विज्ञानका अविद्या, शोक, मोह और भय आदि संसारके बीजभूत दोषोंकी निवृत्तिरूप फल नहीं देखते ? क्या तुम “उस अवस्थामें एकत्व देखनेवालेको क्या मोह और क्या शोक है ?”, “[नारद कहते हैं—] भगवन् ! वह मैं केवल मन्त्रवेत्ता ही हूँ, आत्मवेत्ता नहीं हूँ। मैं शोक करता हूँ, ऐसे मुझको, हे भगवन् ! शोकसे पार कर दीजिये” इत्यादि प्रकारके सैकड़ों उपनिषद्वाक्य नहीं सुनते ? क्या ‘सोऽरोदीत्’ इत्यादि वाक्योंमें इसी प्रकार निश्चित और सफल विज्ञान है ? यदि नहीं है तो भले ही उनकी अप्रामाणिकता |

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