भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 233

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७


प्रामाण्ये फलवन्निश्चितविज्ञानोत्पादकस्य किमित्यप्रामाण्यं स्यात् ?<br><br>तदप्रामाण्ये च दर्शपूर्णमासादिवाक्येषु को विश्रम्भः ।रहे। उनकी अप्रामाणिकतासे सफल और निश्चित विज्ञान उत्पन्न करनेवाले वाक्योंकी अप्रामाणिकता क्यों होनी चाहिये ? यदि उनकी अप्रामाणिकता मानी जाय तो दर्शपूर्णमासादिविषयक वाक्योंमें ही क्या विश्वास किया जा सकता है ?
ननु दर्शपूर्णमासादिवाक्यानां पुरुषप्रवृत्तिविज्ञानोत्पादकत्वात् प्रामाण्यम् । आत्मविज्ञानवाक्येषु तन्नास्तीति ।पूर्व०—दर्श-पूर्णमासादि वाक्योंकी प्रामाणिकता तो पुरुषप्रवृत्तिसम्बन्धी विज्ञानके उत्पन्न करनेवाले होनेसे है; आत्मविज्ञानविषयक वाक्योंमें यह बात नहीं है ।
सत्यमेवम्, नैष दोषः । प्रामाण्यकारणोपपत्तेः । प्रामाण्यकारणं च यथोक्तमेव, नान्यत् ।सिद्धान्ती—ठीक है, ऐसा ही है; किंतु यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि आत्मविज्ञानविषयक वाक्योंमें भी प्रामाणिकताका युक्तियुक्त कारण उपलब्ध है। प्रामाणिकताका कारण जैसा ऊपर बताया गया है वही है, दूसरा नहीं ।
अलङ्कारश्चायम्, यत्सर्वप्रवृत्तिबीजनिरोधफलवद्विज्ञानोत्पादकत्वम् आत्मप्रतिपादकवाक्यानां नाप्रामाण्यकारणम् ।सब प्रकारकी प्रवृत्तिके बीजका निरोध जिसका फल है—ऐसे विज्ञानका उत्पन्न करनेवाला होना तो आत्मप्रतिपादक वाक्योंका भूषण है, यह उनकी अप्रामाणिकताका कारण नहीं हो सकता ।
यत्तूक्तम् "विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत" (बृ० उ० ४ । ४ । २१) इत्यादिवचनानां वाक्यार्थविज्ञानव्यतिरेकेण उपासनार्थ-इसके सिवा यह जो कहा कि "आत्माको जानकर तद्विषयक बुद्धि करे" इत्यादि वाक्य वाक्यार्थविज्ञानसे अलग उपासनाके लिये हैं, सो यह
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