बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 254, कुल 1402 में से
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| २४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| अविद्याधिष्ठान-विचारः<br>न, ब्रह्मणि विद्याविधानात् । न हि शुक्तिकायां रजताध्यारोपणेऽसति शुक्तिकात्वं ज्ञाप्यते चक्षुर्गोचरापन्नायाम्—इयं शुक्तिका न रजतम्, इति । तथा "सदेवेदं सर्वम्" "ब्रह्मैवेदं सर्वम्" "आत्मैवेदं सर्वम्" "नेदं द्वैतमस्त्यब्रह्म" इति ब्रह्मण्येकत्वविज्ञानं न विधातव्यं ब्रह्मण्यविद्याध्यारोपणायाम सत्याम् । | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि ब्रह्ममें विद्याका विधान किया गया है। यदि शुक्तिमें चाँदीका अध्यारोप न हो तो उसके नेत्रेन्द्रियके विषय होनेपर 'यह शुक्ति है चाँदी नहीं है' इस प्रकार उसके शुक्तित्वका ज्ञान नहीं कराया जाता। इसी प्रकार यदि ब्रह्ममें अविद्याका आरोप न होता तो "यह सब सत् ही है" "यह सब ब्रह्ममें ही है" "यह सब आत्मा ही है" "यह अब्रह्मरूप द्वैत नहीं है" इस प्रकार ब्रह्ममें एकत्वज्ञानका विधान नहीं किया जा सकता। |
| न ब्रूमः—शुक्तिकायामिव ब्रह्मण्यतद्धर्माध्यारोपणा नास्तीति, किं तर्हि? न ब्रह्म स्वात्मन्यतद्धर्माध्यारोपनिमित्तम्, अविद्याकर्तृ चेति । | पूर्व०—हम यह नहीं कहते कि शुक्तिमें रजतके समान ब्रह्ममें अब्रह्मके धर्मोंका आरोप नहीं है तो फिर क्या कहते हैं ? हमारा कथन तो यह है ब्रह्म अपनेमें अब्रह्म धर्मोंके आरोपका निमित्त और अविद्या करनेवाला नहीं है। |
| भवत्वेवं नाविद्याकर्तृ भ्रान्तं च ब्रह्म । किन्तु नैवाब्रह्माविद्याकर्ता चेतनो भ्रान्तोऽन्य इष्यते । "नान्योऽतोऽस्ति विज्ञाता" (बृ० उ० ३ । ७ । २३) "नान्यदतोऽस्ति विज्ञातृ" ( ३ । ८ । ११) | सिद्धान्ती—यह हो सकता है कि ब्रह्म अविद्याका कर्ता और भ्रान्त नहीं है, किंतु अविद्याका कर्ता कोई अन्य अब्रह्म भ्रान्त चेतन है—ऐसा भी नहीं माना जाता; जैसा कि "इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं है", "इससे भिन्न कोई जाननेवाला नहीं है", |