बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 255, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २४९
| “तत्त्वमसि” (छा०उ० ६।८-१६)<br>“आत्मानमेवावेत्। अहं ब्रह्मास्मि” (बृ० उ० १।४।१०)<br>“अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद” (१।४।१०) इत्यादि-श्रुतिभ्यः। स्मृतिभ्यश्च— “समं सर्वेषु भूतेषु” (गीता १३।२७)<br>“अहमात्मा गुडाकेश” (गीता १०।२०) “शुनि चैव श्वपाके च” (गीता ५।१८) “यस्तु सर्वाणि भूतानि” इत्यादिभ्यः। “यस्मि-न्सर्वाणि भूतानि” (ईशा०उ० ७) इति च मन्त्रवर्णात्। | “वह तू है”, “अपनेको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ”, “यह अन्य है और मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है वह नहीं जानता।' इत्यादि श्रुतियोंसे “जो समस्त भूतोंमें मुझे समभावसे स्थित [देखता है]”, “हे गुडाकेश! मैं आत्मा हूँ”, “कुत्ते और चाण्डालमें”, “जो समस्त भूतोंको [अपनेहीमें देखता है]” इत्यादि स्मृतियोंसे और “जिस अवस्थामें सब भूत आत्मा ही हो जाते हैं” इस मन्त्रवर्णसे भी सिद्ध होता है। |
| नन्वेवं शास्त्रोपदेशानर्थक्य-मिति। | पूर्व०-किंतु इस प्रकार तो शास्त्रोपदेशकी व्यर्थता प्राप्त होती है। |
| बाढमेवम् अवगतेऽस्त्वेवानर्थ-क्यम्। | सिद्धान्ती-हाँ, ऐसा ही है; तत्त्वज्ञान होनेपर तो उसकी व्यर्थता होगी ही। |
| अवगमानर्थक्यमपीति चेत् ? | पूर्व०-किंतु इससे तो ज्ञानकी भी व्यर्थता सिद्ध होती है! |
| न, अनवगमनिवृत्तेर्दृष्टत्वात्। | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि उससे अज्ञानकी निवृत्ति होती देखी जाती है। |
| तन्निवृत्तेरप्यनुपपत्तिरेकत्व इति चेत् ? | पूर्व०-ब्रह्मका एकत्व माननेपर तो उसकी निवृत्ति भी सङ्गत नहीं है-ऐसा कहें तो?१ |
१. क्योंकि यदि अज्ञाननिवृत्तिको वास्तविक माना जाय तो ब्रह्म और अज्ञान-निवृत्ति दो पदार्थ सिद्ध होंगे, अतः इससे अद्वैतकी हानि होगी। और यदि उसे ब्रह्मरूप माना जाय तो उसका ब्रह्मज्ञानके अधीन होना सिद्ध नहीं हो सकता।