बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 256, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| २५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| न, दृष्टविरोधात् । दृश्यते ह्येकत्वविज्ञानादेवानवगमनिवृत्तिः। <br><br> दृश्यमानमप्यनुपपन्नमिति ब्रुवतो दृष्टविरोधः स्यात्; न च दृष्टविरोधः केनचिदप्यभ्युपगम्यते । न च दृष्टेऽनुपपन्नं नाम, दृष्टत्वादेव । दर्शनानुपपत्तिरिति चेत्तत्राप्येषैव युक्तिः । <br><br> [परजीवयोर्भेदे युक्तयः] "पुण्यं वै पुण्येन कर्मणा भवति" (बृ० उ० ३।२।१३।) "तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते" (४।४।२) "मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः" (प्र० उ० ४।९) इत्येवमादिश्रुतिस्मृतिन्यायेभ्यः परस्माद्विलक्षणोऽन्यः संसार्थवगम्यते । तद्विलक्षणश्च परः "स एष नेति नेति"¹ | सिद्धान्ती— ऐसा मत कहो, क्योंकि इससे दृष्टविरोध आता है। एकत्वज्ञानसे ही अज्ञानकी निवृत्ति होती देखी जाती है । दिखलायी देनेपर भी वह अनुपपन्न ही है—ऐसा कहनेपर तो दृष्टविरोध ही होगा और दृष्टविरोधको कोई भी स्वीकार नहीं करता । कोई भी विषय दिखायी देनेपर वह दृष्टिगोचर (अनुभूत) होनेके कारण ही अनुपपन्न नहीं हो सकता । यदि कहो कि दर्शन (अनुभव) की भी अनुपपत्ति हो सकती है, तो उसमें भी यही युक्ति है।² <br><br> पूर्व०— "पुण्यकर्मके द्वारा पुरुष पुण्यात्मा होता है", "पुरुषकी उपासना और कर्म उसका [परलोकमें] अनुसरण करते हैं" "मनन करनेवाला, ज्ञाता, कर्ता और विज्ञानात्मा पुरुष है" इत्यादि श्रुति-स्मृति और न्यायसे संसारी जीव परमात्मासे भिन्न ज्ञात होता है। तथा उससे विलक्षण परमात्मा "वह यह (कार्य) नहीं है, [कारण] नहीं है" |
१. यह मन्त्रांश इस उपनिषद्के ४।२।४, ४।४।२२ और ४।५।१५ में भी है।
२. अर्थात् उसकी अनुपपत्ति भी अनुभवके ही आधारपर सिद्ध की जायगी । इसलिये अनुभवके अनुपपन्न होनेका कोई कारण नहीं है ।