बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| न, दृष्टविरोधात् । दृश्यते ह्येकत्वविज्ञानादेवानवगमनिवृत्तिः। <br><br> दृश्यमानमप्यनुपपन्नमिति ब्रुवतो दृष्टविरोधः स्यात्; न च दृष्टविरोधः केनचिदप्यभ्युपगम्यते । न च दृष्टेऽनुपपन्नं नाम, दृष्टत्वादेव । दर्शनानुपपत्तिरिति चेत्तत्राप्येषैव युक्तिः । <br><br> [परजीवयोर्भेदे युक्तयः] "पुण्यं वै पुण्येन कर्मणा भवति" (बृ० उ० ३।२।१३।) "तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते" (४।४।२) "मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः" (प्र० उ० ४।९) इत्येवमादिश्रुतिस्मृतिन्यायेभ्यः परस्माद्विलक्षणोऽन्यः संसार्थवगम्यते । तद्विलक्षणश्च परः "स एष नेति नेति"¹ | सिद्धान्ती— ऐसा मत कहो, क्योंकि इससे दृष्टविरोध आता है। एकत्वज्ञानसे ही अज्ञानकी निवृत्ति होती देखी जाती है । दिखलायी देनेपर भी वह अनुपपन्न ही है—ऐसा कहनेपर तो दृष्टविरोध ही होगा और दृष्टविरोधको कोई भी स्वीकार नहीं करता । कोई भी विषय दिखायी देनेपर वह दृष्टिगोचर (अनुभूत) होनेके कारण ही अनुपपन्न नहीं हो सकता । यदि कहो कि दर्शन (अनुभव) की भी अनुपपत्ति हो सकती है, तो उसमें भी यही युक्ति है।² <br><br> पूर्व०— "पुण्यकर्मके द्वारा पुरुष पुण्यात्मा होता है", "पुरुषकी उपासना और कर्म उसका [परलोकमें] अनुसरण करते हैं" "मनन करनेवाला, ज्ञाता, कर्ता और विज्ञानात्मा पुरुष है" इत्यादि श्रुति-स्मृति और न्यायसे संसारी जीव परमात्मासे भिन्न ज्ञात होता है। तथा उससे विलक्षण परमात्मा "वह यह (कार्य) नहीं है, [कारण] नहीं है" |
१. यह मन्त्रांश इस उपनिषद्के ४।२।४, ४।४।२२ और ४।५।१५ में भी है।
२. अर्थात् उसकी अनुपपत्ति भी अनुभवके ही आधारपर सिद्ध की जायगी । इसलिये अनुभवके अनुपपन्न होनेका कोई कारण नहीं है ।
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २५१ |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २५१ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| (बृ० उ० ३ । ९ । २६) "अशनायाद्यत्येति" "य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युः" (छा० उ० ८ । ७ । १) "एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने" (बृ० उ० ३ । ८ । ९) इत्यादिश्रुतिभ्यः। कणादाक्षपादादितर्कशास्त्रेषु च संसारिविलक्षण ईश्वर उपपत्तितः साध्यते। संसारदुःखापनयार्थित्वप्रवृत्तिदर्शनात्स्फुटमन्यत्वमीश्वरात्संसारिणोऽवगम्यते। "अवाक्यनादरः" (छा० उ० ३ । १४ । २) "न मे पार्थास्ति" (गीता ३ । २२) इति श्रुतिस्मृतिभ्यः । | "क्षुधादिका उल्लङ्घन किये हुए है", "जो आत्मा निष्पाप, जराशून्य और मृत्युहीन है" "निश्चय इस अक्षरके प्रकृष्ट शासनमें" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। कणाद और गौतमादिके तर्कशास्त्रोंमें भी युक्तिसे संसारी जीवसे पृथक् ईश्वर सिद्ध किया जाता है। संसारदुःखकी निवृत्तिके प्रयोजनसे जीवकी प्रवृत्ति देखी जानेके कारण ईश्वरसे जीवका अन्यत्व स्पष्टतया ज्ञात होता है; जैसा कि [आत्मा] "वाक्रहित और सम्भ्रमशून्य है" इस श्रुतिसे और "हे पार्थ! मेरा कोई कर्तव्य नहीं है" इस स्मृतिसे सिद्ध होता है। |
| "सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः" (छा० उ० ८ । ७ । १) "तं विदित्वा न लिप्यते" (बृ० उ० ४ । ४ । २३) "ब्रह्मविदाप्नोति परम्" (तै० उ० २ । १ । १) "एकधैवानुद्रष्टव्यमेतत्" (बृ० उ० ४।४।२०) "यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वा" (३ । ८ । १०) "तमेव धीरो विज्ञाय" (४ । ४ । २१) "प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते" (मु० उ० २ । २ । ४) इत्यादिकर्मकर्तृनिर्देशाच्च । | इसके सिवा "वह अन्वेषण करने योग्य और विशेषरूपसे जिज्ञासा करने योग्य है", "उसे जानकर लिप्त नहीं होता", "ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता है," "इसे एक रूपसे ही देखना चाहिये", "हे गार्गि ! जो कोई इस अक्षरको न जानकर," "बुद्धिमान् पुरुष उसे ही जानकर", "प्रणव धनुष है, आत्मा (मन) बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य है" इत्यादि वाक्योंसे जीव और ईश्वरका कर्तृत्व और कर्मत्व बतलाये जानेसे भी [उनमें भेद सिद्ध होता है]। |
२५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| मुमुक्षोश्च गतिमार्गविशेषदेशोपदेशात् । असति भेदे कस्य कुतो गतिः स्यात् ? तदभावे च दक्षिणोत्तरमार्गविशेषानुपपत्तिः, गन्तव्यदेशानुपपत्तिश्चेति । भिन्नस्य तु परमादात्मनः सर्वमेतदुपपन्नम् । | तथा मुमुक्षुके लिये [देवयानादि] गति और [अर्चिरादि] मार्गविशेषका उपदेश होनेके कारण भी [ऐसा ही जान पड़ता है]। यदि भेद न हो तो किसका कहाँसे गमन होगा ? और गतिका अभाव माना जाय तो दक्षिणायन-उत्तरायणसंज्ञक मार्गविशेषोंकी तथा गन्तव्य देशकी उपपत्ति नहीं हो सकती। परमात्मासे भिन्न आत्माके लिये तो यह सभी उपपन्न हो सकता है। |
| कर्मज्ञानसाधनोपदेशाच्च—<br><br>भिन्नश्चेदूब्रह्मणः संसारी स्यात्, युक्तस्तं प्रत्यभ्युदयनिःश्रेयससाधनयोः कर्मज्ञानयोरुपदेशो नेश्वरस्याप्तकामतत्वात् । तस्माद्युक्तं ब्रह्मेति ब्रह्मभावी पुरुष उच्यत इति चेत् ? | कर्म और ज्ञानरूप साधनोंका उपदेश होनेके कारण भी [उनका भेद है]। यदि संसारी जीव ब्रह्मसे भिन्न होगा तभी उसके लिये भोग और मोक्षके साधनभूत कर्म और ज्ञानका उपदेश हो सकेगा, ईश्वरको इनका उपदेश नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह तो आप्तकाम है। अतः यही ठीक है कि 'ब्रह्म' शब्दसे भविष्यमें ब्रह्मभावको प्राप्त होनेवाला पुरुष ही कहा गया है— ऐसा मानें तो ? |
| न; ब्रह्मोपदेशानर्थक्यप्रसङ्गात् । संसारी चेद्ब्रह्मभाव्यब्रह्म सन्<br>(भेदवाद-निरसनम्) | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि तब तो ब्रह्मोपदेशकी ही व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा। यदि भविष्यमें ब्रह्मभावको प्राप्त होनेवाला संसारी ही अब्रह्म |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २५३ |
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २५३ |
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| संस्कृत मूल (भाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
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| विदित्वात्मानमेवाहं ब्रह्मास्मीति सर्वमभवत्तस्य संसारात्मविज्ञानादेव सर्वात्मभावस्य फलस्य सिद्धत्वात्परब्रह्मोपदेशस्य ध्रुवमानर्थक्यं प्राप्तम्। | होते हुए अपनेको 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा जानकर सर्वरूप हो गया तो उसे संसारी जीवके विज्ञानसे ही सर्वात्मभावरूप फल प्राप्त होनेके कारण परब्रह्मोपदेशकी निश्चय ही व्यर्थता प्राप्त हुई। |
| तद्विज्ञानस्य क्वचित्पुरुषार्थसाधनेऽविनियोगात्संसारिण एवाहं ब्रह्मास्मीति ब्रह्मत्वसम्पादनार्थ उपदेश इति चेत्। अनिज्ञाते हि ब्रह्मस्वरूपे किं सम्पादयेदहं ब्रह्मास्मीति। निर्ज्ञातलक्षणे हि ब्रह्मणि शक्या सम्पत्कर्तुम्। | पूर्व०—ब्रह्मज्ञानका कहीं पुरुषार्थके साधनमें विनियोग न होनेके कारण संसारी जीवको ही 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार ब्रह्मभाव सम्पादन करानेके लिये यह उपदेश हो तो? ब्रह्मका स्वरूप अच्छी तरह जाने बिना 'मैं ब्रह्म हूँ' इस उपदेशसे संसारी जीव क्या सम्पादन कर सकता है? क्योंकि ब्रह्मके लक्षणोंका सम्यक् प्रकारसे ज्ञान हो जानेपर ही [ब्रह्मरूपताका] सम्पादन किया जा सकता है। |
| न; “अयमात्मा ब्रह्म” (बृ० उ० २।५।१९) “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” (३।४।१) “य आत्मा” (छा० उ० ८।७।१) “तत्सत्यं स आत्मा” (छा० उ० ६।८।७) “ब्रह्मविदाप्नोति परम्” (तै० उ० २।१।१) इति प्रकृत्य “तस्माद्वा एतस्मादात्मनः” (२।१।१) | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है। “यह आत्मा ब्रह्म है,” “जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है”, ‘जो आत्मा अपहतपाप्मा,’ “वह सत्य है, वह आत्मा है”, तथा “ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता है” इस प्रकार प्रसङ्ग उठाकर “उस इस आत्मासे [आकाश उत्पन्न हुआ]” इत्यादि |
२५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| इति सहस्रशो ब्रह्मात्मशब्दयोः सामानाधिकरण्यादेकार्थत्वमेवेत्यवगम्यते। अन्यस्य ह्यन्यत्वे सम्पत्क्रियते नैकत्वे। "इदं सर्वं यदयमात्मा" (बृ० उ० २।४।६) इति च प्रकृतस्यैव द्रष्टव्यस्यात्मन एकत्वं दर्शयति। तस्मान्नात्मनो ब्रह्मत्वसम्पदुपपत्तिः। | सहस्रों श्रुतियोंसे 'ब्रह्म' और 'आत्मा' शब्दोंका सामानाधिकरण्य देखे जानेसे इनका एक ही अर्थ है—यह बात ज्ञात होती है। तथा एक पदार्थसे दूसरेके भिन्न होनेपर ही [उसकी तद्रूपताका] सम्पादन किया जाता है, एक होनेपर नहीं। किंतु "यह जो कुछ है सब आत्मा है" यह श्रुति इस प्रकृत द्रष्टव्य आत्माका एकत्व दिखलाती है। अतः आत्माके लिये ब्रह्मत्व-सम्पादन करना उपपन्न नहीं है। |
| न चाप्यन्यत्प्रयोजनं ब्रह्मोपदेशस्य गम्यते, "ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति" (मु० उ० ३।२।९) "अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि" (बृ० उ० ४।२।४) "अभयं हि वै ब्रह्म भवति" (४।४।२५) इति च तदापत्तिश्रवणात्। सम्पत्तिश्चेत्तदापत्तिर्न स्यात्। न ह्यन्यस्यान्यभाव उपपद्यते। | इसके सिवा ब्रह्मोपदेशका कोई दूसरा प्रयोजन भी जाना नहीं जाता; क्योंकि "ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही होता है," "हे जनक! निश्चय तू अभयको प्राप्त हो गया है," "[जो ब्रह्मको इस प्रकार जानता है] वह निर्भय ब्रह्म हो जाता है।" इत्यादि वाक्योंसे ब्रह्मकी प्राप्ति सुनी गयी है। यदि आत्माकी ब्रह्मसम्पत्ति विवक्षित होती तो उसे ब्रह्मत्वकी प्राप्ति नहीं हो सकती थी, क्योंकि एक वस्तुका अन्यभाव हो जाना सम्भव नहीं है। |
| वचनात् सम्पत्तेरपि तद्भावा- | पूर्व०—श्रुतिका १ वचन होनेके कारण ब्रह्मसम्पत्तिसे भी ब्रह्मभावकी |
१. 'तं यथा यथोपासते तदेव भवति'—उसे जिस-जिस प्रकार उपासना करता है तद्रूप ही हो जाता है—यही श्रुतिका वचन है।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५५
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५५
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| पत्तिः स्यादिति चेत् ? | प्राप्ति हो सकती है-ऐसा मानें तो ? |
| न, सम्पत्तेः प्रत्ययमात्रत्वात् । विज्ञानस्य च मिथ्याज्ञाननिवर्त्तकत्वव्यतिरेकेणाकारकत्वमित्यवोचाम । न च वचनं वस्तुनः सामर्थ्यजनकम् । ज्ञापकं हि शास्त्रं न कारकमिति स्थितिः । "स एष इह प्रविष्टः” (बृ० उ० १ । ४ । ७) इत्यादिवाक्येषु च परस्यैव प्रवेश इति स्थितम् । तस्माद्ब्रह्मेति न ब्रह्मभाविपुरुषकल्पना साध्वी । | सिद्धान्ती-ऐसा मानना ठीक नहीं, क्योंकि सम्पत्ति तो केवल प्रत्यय (प्रतीति) मात्र होती है। विज्ञान तो मिथ्या ज्ञानका निवर्त्तक होनेके सिवा और कुछ करनेवाला है नहीं-ऐसा हम पहले कह चुके हैं। शास्त्र-वचन किसी वस्तुमें कोई सामर्थ्य पैदा करनेवाला नहीं होता, क्योंकि शास्त्र केवल ज्ञापक है कारक नहीं-यही वास्तविक स्थिति है। "वह यह ब्रह्म इसमें प्रविष्ट हुआ” इत्यादि वाक्योंमें परमात्माका ही [ शरीरमें ] प्रवेश निश्चय किया गया है। अतः 'ब्रह्म' यह ब्रह्मभावी पुरुषका वाचक है-ऐसी कल्पना करना ठीक नहीं है। |
| इष्टार्थबाधनाच्च । सैन्धवघनवदनन्तरमबाह्यमेकरसं ब्रह्मेति विज्ञानं सर्वस्यामुपनिषदि प्रतिपिपादयिषितोऽर्थः। काण्डद्वयेऽप्यन्तेऽवधारणादवगम्यते "इत्यनुशासनम्” “एतावदरे खल्वमृतत्वम्” इति । | इसके सिवा इष्ट अर्थका बाध होनेके कारण भी [ इससे ब्रह्मभावी पुरुष अभिप्रेत नहीं है ]। नमकके डलेके समान ब्रह्म अविच्छिन्न, अबाह्य और एकरस है-यह विज्ञान ही समस्त उपनिषदोंमें प्रतिपादनके लिये अभीष्ट विषय है। "इत्यनुशासनम्” और “एतावदरे खल्वमृतत्त्वम्” इन वाक्योंसे इस उपनिषद्के दो काण्डोंके अन्तमें निर्णय करनेसे भी यही ज्ञात होता है। |
१. मधुकाण्ड ( अ० २ ब्रा० ५ ) और मुनिकाण्ड ( अ० ४ ब्रा० ५ ) ।
२५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| तथा सर्वशाखोपनिषत्सु च ब्रह्मैकत्वविज्ञानं निश्चितोऽर्थः । तत्र यदि संसारी ब्रह्मणोऽन्य आत्मानमेवावेदिति कल्प्येत, इष्टस्यार्थस्य बाधनं स्यात् । तथा च शास्त्रमुपक्रमोपसंहारयोर्विरोधादसमञ्जसं कल्पितं स्यात् । | इसी प्रकार सम्पूर्ण शाखाओंके उपनिषदोंमें भी ब्रह्मैकत्व-विज्ञान ही निश्चित अर्थ है, वहाँ यदि ऐसी कल्पना की जाय कि ब्रह्मसे भिन्न संसारी जीवने अपनेको ही जाना तो इष्ट अर्थका बाध होगा । इससे 'उपक्रम और उपसंहारमें विरोध होनेके कारण शास्त्र असंगत है' ऐसी कल्पना हो जायगी । | | व्यपदेशानुपपत्तेश्च । यदि च 'आत्मानमेवावेत्' इति संसारी कल्प्येत, ब्रह्मविद्या इति व्यपदेशो न स्यात् । आत्मानमेवावेदिति संसारिण एव वेद्यत्वोपपत्तेः । | व्यपदेश (नाम) की अनुपपत्ति होनेसे भी [ संसारी जीव 'ब्रह्म' शब्दका वाच्य नहीं हो सकता ] । यदि 'आत्मानमेवावेत्' इस वाक्यमें 'जानना' इस क्रियाका कर्ता संसारी जीव माना जाय तो इस विद्याका 'ब्रह्मविद्या' यह नाम नहीं हो सकता; क्योंकि 'अपनेको ही जाना' इस वाक्यके अनुसार [ संसारी जीवका ] स्वयं संसारी जीव ही वेद्य होना सम्भव है । | | आत्मेति वेदितुरन्यदुच्यत इति चेन्न, अहं ब्रह्मास्मीति विशेषणात् । अन्यश्चेद्ध्येयः स्यादयमसाविति वा विशेष्येत न त्वहमस्मीति । अहमस्मीति विशेषणादात्मानमेवा- | यदि कहो कि 'आत्मा' इस शब्दसे कहा हुआ वेद्य वेत्तासे भिन्न बतलाया गया है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उसे 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार [ अहंरूपसे ] विशेषित किया गया है । यदि वेद्य वेत्तासे भिन्न होता तो उसे 'यह' अथवा 'वह' कहकर विशेषित किया जाता 'मैं हूँ' ऐसा कहकर नहीं । 'मैं हूँ' इस प्रकार विशेषित |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २६७
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २६७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| वेदिति चावधारणान्निश्चितमात्मैव ब्रह्मेत्यवगम्यते । तथा च सत्युपपन्नो ब्रह्मविद्याव्यपदेशो नान्यथा । संसारिविद्या ह्यन्यथा स्यात् । न च ब्रह्मत्वाब्रह्मत्वे ह्येकस्योपपन्ने परमार्थतः, तमःप्रकाशाविव भानोर्विरुद्धत्वात् । | करनेसे और 'अपनेको ही जाना' ऐसा निश्चय करनेसे यह निश्चितरूपसे ज्ञात होता है कि स्वयं आत्मा ही ब्रह्म है। ऐसा होनेपर ही इस विद्याका 'ब्रह्मविद्या' यह नाम उपपन्न हो सकता है और किसी प्रकार नहीं। अन्यथा माननेपर तो इसका नाम 'संसारिविद्या' होगा। जिस प्रकार विरुद्ध होनेके कारण अन्धकार और प्रकाश ये दोनों ही सूर्यके धर्म नहीं हो सकते उसी प्रकार एक ही आत्माके ब्रह्मत्व और अब्रह्मत्व ये दोनों धर्म परमार्थतः उपपन्न नहीं हो सकते। |
| न चोभयनिमित्तत्वे ब्रह्मविद्येति निश्चितो व्यपदेशो युक्तः। तदा ब्रह्मविद्या संसारिविद्या च स्यात् । न च वस्तुनोऽर्धजरतीयत्वं कल्पयितुं युक्तं तत्त्वज्ञानविवक्षायाम्, श्रोतुः संशयो हि तथा स्यात् । निश्चितं च ज्ञानं पुरुषार्थसाधनमिष्यते "यस्य | इसके सिवा यदि प्रस्तुत विज्ञानके ये दोनों ही निमित्त हों तो भी उसका 'ब्रह्मविद्या' यह निश्चित व्यपदेश उपपन्न नहीं है। उस अवस्थामें वह ब्रह्मविद्या और संसारिविद्या भी कहलायेगी और तत्त्वज्ञानका निरूपण करना अभीष्ट होनेपर वस्तुके विषयमें अर्धजरतीय-कल्पना करनी उचित नहीं है; क्योंकि ऐसा करनेपर सुननेवालेको संदेह होगा। पुरुषार्थका साधन तो निश्चित ज्ञान ही माना जाता है; जैसा कि |
१. एक ही वस्तुके विषयमें दो विरुद्ध कल्पना करना अर्धजरतीयन्याय कहलाता है; जैसे कोई कहे कि आधी गाय तो बूढ़ी हो गयी है ओर आधी बच्चा देनेमें समर्थ है।
बृ० उ० १७—
२५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| स्यादद्धा न विचिकित्सास्ति” (छा० उ० ३।१४।४) “संशयात्मा विनश्यति” (गीता ४।४०) इति श्रुतिस्मृतिभ्याम् । अतो न संशयितो वाक्यार्थो वाच्यः परहितार्थिना । | “जिसका ऐसा निश्चय है और जिसे इस विषयमें कोई संदेह भी नहीं है [ उसे ही ब्रह्म-साक्षात्कार होता है ]” इस श्रुतिसे और “संशयात्मा नष्ट हो जाता है” इस स्मृतिसे सिद्ध होता है। अतः दूसरोंका हित चाहनेवाले पुरुषको वाक्यका संशययुक्त अर्थ नहीं करना चाहिये। | | ब्रह्मणि साधकत्वकल्पना अस्मदादिष्विवापेशाला ‘तदात्मानमेवावेत्तस्मात्तत्सर्वमभवत्’ इति—इति चेत् ? | पूर्व०—किंतु ‘उसने अपनेको ही जाना [ कि मैं ब्रह्म हूँ ] अतः वह सर्व हो गया’ इस वाक्यके अनुसार हमलोगोंकी तरह ब्रह्ममें साधकत्वकी कल्पना करनी तो अच्छी नहीं है ? | | न, शास्त्रोपालम्भात् । न ह्यस्मत्कल्पनेयम्, शास्त्रकृता तु; तस्माच्छास्त्रस्यायमुपालम्भः । न च ब्रह्मण इष्टं चिकीर्षुणा शास्त्रार्थविपरीतकल्पनया स्वार्थपरित्यागः कार्यः । न चैतावत्येवाक्षमा युक्ता भवतः । सर्वं हि नानात्वं ब्रह्मणि कल्पितमेव “एकधैवानुद्रष्टव्यम्” (बृ० उ० ४।४।२०) “नेह नानास्ति किञ्चन” (४।४।१९) “यत्र हि द्वैतमिव भवति” (२।४।१४) “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६।२।१) इत्यादिवा- | सिद्धान्ती—ऐसा न कहो, क्योंकि यह उपालम्भ शास्त्रके लिये है। यह हमारी कल्पना नहीं है, अपितु शास्त्रकी की हुई है, अतः यह शास्त्रके ही लिये उपालम्भ है। और ब्रह्मका इष्ट करनेकी इच्छावाले पुरुषको शास्त्रके अर्थसे विपरीत कल्पना करके उसके अर्थका परित्याग नहीं करना चाहिये। आपके लिये इतनी अक्षमा उचित नहीं है । सारा नानात्व ब्रह्ममें कल्पित ही है। “उसे एकरूप ही देखना चाहिये”, “यहाँ नाना कुछ भी नहीं है”, “जहाँ द्वैत-सा होता है”, “एक ही अद्वितीय ब्रह्म है” इत्यादि सैकड़ों |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २५९
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २५९
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| क्यशतेभ्यः। सर्वो हि लोकव्यवहारो ब्रह्मण्येव कल्पितो न परमार्थः सन्, इत्यत्यल्पमिदमुच्यते ‘इयमेव कल्पना अपेशला’ इति। | वाक्योंसे यही बात कही गयी है। ब्रह्ममें तो सारा ही लोकव्यवहार कल्पित ही है; यह परमार्थतः सत् नहीं है; अतः ‘यही कल्पना अच्छी नहीं है’ यह तो तुम बहुत छोटी बात कहते हो। |
| तस्माद् यत्प्रविष्टं स्रष्टृ ब्रह्म तद्ब्रह्म। वैशब्दोऽवधारणार्थः। इदं शरीरस्थं यद् गृह्यते, अग्रे प्राक्प्रतिबोधादपि ब्रह्मैवासीत्, सर्वं चेदम्। किन्त्वप्रतिबोधात् अब्रह्मास्म्यसर्वं च’ इत्यात्मन्यध्यारोपात् ‘कर्ताहं क्रियावान्फलानां च भोक्ता सुखी दुःखी संसारी’ इति चाध्यारोपयति। परमार्थतस्तु ब्रह्मैव तद्विलक्षणं सर्वं च। तत्कथञ्चिदाचार्येण दयालुना प्रतिबोधितम् ‘नासि संसारी’ इत्यात्मानमेवावेत्स्वाभाविकम्। अविद्याध्यारोपितविशेषवर्जितमिति एवशब्दस्यार्थः। | अतः जो सृष्टिकर्ता ब्रह्म प्रविष्ट हुआ था, वही यह ब्रह्म है। ‘ब्रह्म वै’ इसमें ‘वै’ शब्द निश्चयार्थक है। ‘इदम्’ अर्थात् यह जो शरीरमें स्थित दिखायी देता है ‘अग्रे’—बोध होनेसे पूर्व भी ब्रह्म ही था तथा यह सर्व भी था। किंतु अज्ञानवश आत्मामें ‘मैं अब्रह्म हूँ, असर्व हूँ’ ऐसा आरोप कर लेनेसे ‘मैं कर्ता हूँ, क्रियावान् हूँ, फलोंका भोक्ता हूँ, सुखी हूँ, दुःखी हूँ और संसारी हूँ’ ऐसा अध्यारोप कर लेता है। वस्तुतः तो वह उससे विलक्षण ब्रह्म और सर्वरूप ही है। उसने दयालु आचार्यद्वारा किसी प्रकार ‘तू संसारी नहीं है’ ऐसा बोध कराये जानेपर स्वाभाविक आत्माको ही जाना। ‘आत्मानमेव’ इसमें ‘एव’ शब्दका यह अभिप्राय है कि ‘उसने अविद्याद्वारा आरोपित विशेषसे रहित-निर्विशेष आत्माको जाना।’ |
| ब्रूहि कोऽसावात्मा स्वाभा- | पूर्व०-अच्छा, बताओ वह स्वा- |
२६० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
२६० बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
[आत्मस्वरूप-विवेचनम्]
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| विकः, यमात्मानं विदितवद्ब्रह्म। | भाविक आत्मा कौन है? जिसे ब्रह्मने जाना। |
| ननु न स्मरस्यात्मानम्, दर्शितो ह्यसौ, य इह प्रविश्य प्राणित्यपानिति व्यानित्युदानिति समानितीति। | **सिद्धान्ती—**क्या तुम्हें आत्माका स्मरण नहीं रहा; उसे 'जो यह शरीरमें प्रवेश करके प्राण, अपान, व्यान, उदान और समानकी क्रियाएँ करता है वह आत्मा है' इस प्रकार प्रदर्शित किया था। |
| ननु 'असौ गौः, असावश्वः' इत्येवमसौ व्यपदिश्यते भवता नात्मानं प्रत्यक्षं दर्शयसि। | **पूर्व०—**किंतु 'वह गौ है, वह घोड़ा है' इत्यादिरूपसे तुम उसका नामनिर्देश तो करते हो, परंतु आत्माको प्रत्यक्ष नहीं दिखाते। |
| एवं तर्हि द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता, स आत्मेति। | **सिद्धान्ती—**तो फिर ऐसा समझो कि जो द्रष्टा, श्रोता, मन्ता और विज्ञाता है, वह आत्मा है। |
| नन्वत्रापि दर्शनादिक्रियाकर्तुः स्वरूपं न प्रत्यक्षं दर्शयसि। न हि गमिरेव गन्तुः स्वरूपं छिदिर्वा छेत्तुः। | **पूर्व०—**किंतु यहाँ भी तुम दर्शनादि क्रिया करनेवालेका स्वरूप प्रत्यक्ष नहीं दिखाते। जाना ही जानेवालेका और छेदन ही छेदन करनेवालेका स्वरूप नहीं है। |
| एवं तर्हि दृष्टेर्द्रष्टा श्रुतेः श्रोता मतेर्मन्ता विज्ञातेर्विज्ञाता, स आत्मेति। | **सिद्धान्ती—**तो फिर जो दृष्टिका द्रष्टा, श्रुतिका श्रोता, मतिका मन्ता और विज्ञातिका विज्ञाता है, वही आत्मा है—ऐसा समझो। |
| नन्वत्र को विशेषो द्रष्टरि? यदि दृष्टेर्द्रष्टा, यदि वा घटस्य | **पूर्व०—**किंतु इससे द्रष्टामें क्या विशेषता हुई? चाहे दृष्टिका द्रष्टा हो चाहे घटका द्रष्टा, वह तो सब |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६१
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६१
| संस्कृत | हिन्दी |
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| द्रष्टा, सर्वथापि द्रष्टैव। द्रष्टव्य एव तु भवान्विशेषमाह दृष्टेर्द्रष्टेति द्रष्टा तु यदि दृष्टेः, यदि वा घटस्य, द्रष्टा द्रष्टैव। | तरहसे द्रष्टा ही रहा। दृष्टिका द्रष्टा कहकर तो आप केवल द्रष्टव्यमें ही विशेषता बतलाते हैं। द्रष्टा तो चाहे दृष्टिका हो चाहे घटका, द्रष्टा द्रष्टा ही है। |
| न, विशेषोपपत्तेः। अस्त्यत्र विशेषः—दृष्टेर्द्रष्टा स दृष्टिश्चेद्भवति नित्यमेव पश्यति दृष्टिम्, न कदाचिदपि दृष्टिर्न दृश्यते द्रष्ट्रा; तत्र द्रष्टुर्दृष्ट्या नित्यया भवितव्यम्, अनित्या चेद् द्रष्टुर्दृष्टिः, तत्र दृश्या या दृष्टिः सा कदाचिन्न दृश्येतापि, यथानित्यया दृष्ट्या घटादि वस्तु। न च तद्वद् दृष्टेर्द्रष्टा कदाचिदपि न पश्यति दृष्टिम्। | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि घटद्रष्टा और दृष्टिद्रष्टाका भेद सम्भव है। यहाँ एक भेद है—जो दृष्टिका द्रष्टा है वह, यदि दृष्टि होती है तो, उसे नित्य ही देखता है। ऐसा नहीं होता कभी द्रष्टाको दृष्टि न भी दिखायी पड़े। उस अवस्थामें द्रष्टाकी दृष्टि नित्य होनी चाहिये। यदि द्रष्टाकी दृष्टि अनित्य होगी तो उसकी दृश्यभूता जो दृष्टि है वह कभी नहीं भी देखी जायगी, जैसे कि अनित्य दृष्टिसे घटादि वस्तु। किंतु उसके समान दृष्टिका द्रष्टा कभी दृष्टिको न देखता हो—ऐसी बात नहीं है। |
| किं द्वे दृष्टी द्रष्टुः—नित्या अदृश्या, अन्या अनित्या दृश्येति ? | पूर्व०—तो क्या द्रष्टाकी दो दृष्टियाँ हैं—एक नित्य और अदृश्य तथा दूसरी अनित्य और दृश्य ? |
| बाढम्; प्रसिद्धा तावदनित्या दृष्टिः, अन्धानन्धत्वदर्शनात्। नित्यैव चेत्सर्वोऽनन्ध एव | सिद्धान्ती—हाँ, लोकमें अन्धत्व और अनन्धत्व दोनों देखे जानेसे अनित्य दृष्टि तो प्रसिद्ध ही है। यदि यह दृष्टि नित्य ही होती तो सब अनन्ध (नेत्रवान्) ही होते। |
२६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १
| २६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| स्यात् । द्रष्टुस्तु नित्या दृष्टिः “न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते”—इति श्रुतेः । अनुमानाच्च—अन्धस्यापि घटाद्याभासविषया स्वप्ने दृष्टिरुपलभ्यते, सा तर्हीतरदृष्टिनाशे न नश्यति, सा द्रष्टुर्द्दृष्टिः । तयाविपरिलुप्तया नित्यया दृष्ट्या स्वरूपभूतया स्वयञ्ज्योतिःसमाख्ययेतरामनित्यां दृष्टिं स्वप्नबुद्धान्तयोर्वासनाप्रत्ययरूपां नित्यमेव पश्यन्दृष्टेर्द्रष्टा भवति । एवञ्च सति दृष्टिरेव स्वरूपमस्याग्न्युष्ण्यवत् , न काणादानामिव दृष्टिव्यतिरिक्तोऽन्यश्चेतनो द्रष्टा । | किन्तु “द्रष्टाकी दृष्टिका कभी लोप नहीं होता” इस श्रुतिके अनुसार द्रष्टाकी दृष्टि तो नित्य है। यह बात अनुमानसे भी सिद्ध होती है। अन्धे पुरुषकी भी स्वप्नमें घटाभासादिविषयिणी दृष्टि देखी जाती है। वह दृष्टि अन्य (नेत्र-सम्बन्धिनी) दृष्टिका नाश हो जानेपर भी नष्ट नहीं होती। वह द्रष्टाकी दृष्टि है। उस कभी लुप्त न होनेवाली स्वयंज्योतिःसंज्ञिका स्वरूपभूता नित्यदृष्टिसे स्वप्न और जाग्रत् अवस्थाओंमें रहनेवाली वासना-प्रत्ययरूपा दृष्टिको नित्य ही देखते रहनेके कारण वह दृष्टिका द्रष्टा होता है। ऐसा होनेके कारण अग्निकी उष्णताके समान दृष्टि ही आत्माका स्वरूप है। कणादमतावलम्बियोंकी मान्यताके समान दृष्टिसे भिन्न कोई अन्य चेतन द्रष्टा नहीं है। |
| तद्ब्रह्म आत्मानमेव नित्यदृग्रूपमध्यारोपितानित्यदृष्ट्यादिवर्जितमेवावेदविदितवत् । | उस ब्रह्मने जो अन्य आरोपित अनित्य दृष्टि आदिसे रहित है, उस नित्यदृग्रूप आत्माको ही अवेत्—जाना। |
| ननु विप्रतिषिद्धं “न विज्ञाते- | पूर्वं०—किन्तु “विज्ञानशक्तिके |
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६३
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६३
| संस्कृत | हिन्दी |
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| विज्ञातारं विजानीयाः” ( बृ० उ० ३ । ४ । २ ) इति श्रुतेः, विज्ञातुर्विज्ञानम् । | विज्ञाताको तुम नहीं जान सकते" ऐसी श्रुति होनेसे विज्ञाता (आत्मा) को जानना तो विरुद्ध कथन जान पड़ता है। |
| न, एवं विज्ञानान्न विप्रतिषेधः । एवं दृष्टेर्द्रष्टेति विज्ञायत एव । अन्यज्ञानानपेक्षत्वाच्च— | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है। इस प्रकारके विज्ञानसे इस श्रुतिका विरोध नहीं होता। 'वह दृष्टिका द्रष्टा है' इस प्रकार तो वह जाना ही जाता है। इसके सिवा अन्य ज्ञानकी अपेक्षा न होनेके कारण भी [ इस कथनमें विरोध नहीं है ]। |
| न च द्रष्टुर्नित्यैव दृष्टिरित्येवं विज्ञाते द्रष्टृविषयां दृष्टिमन्यामाकाङ्क्षते । निवर्तते हि द्रष्टृविषयदृष्ट्याकाङ्क्षादसम्भवादेव। न ह्यविद्यमाने विषय आकाङ्क्षा कस्यचिदुपजायते। न च दृश्या दृष्टिर्द्रष्टारं विषयीकर्तुमुत्सहते, यतस्तामाकाङ्क्षेत। न च स्वरूपविषयाकाङ्क्षा स्वस्यैव। तस्मादज्ञानाध्यारोपणनिवृत्तिरेव 'आत्मानमे- | द्रष्टाकी दृष्टि नित्या ही है—ऐसा ज्ञान हो जानेपर उस दृष्टिको विषय करनेवाली किसी अन्य दृष्टिकी अपेक्षा नहीं होती। बल्कि इससे तो द्रष्टाको विषय करनेवाली दृष्टिकी आकाङ्क्षा निवृत्त हो जाती है, क्योंकि उसका होना असम्भव ही है। जो वस्तु विद्यमान नहीं होती उसके लिये किसीकी आकाङ्क्षा नहीं हुआ करती। कोई भी दृश्यभूता दृष्टि द्रष्टाको विषय करनेमें समर्थ नहीं है, जिससे कि उसकी आकाङ्क्षा की जाय और अपने स्वरूपके विषयमें अपने ही आकाङ्क्षा हुआ नहीं करती। अतः 'आत्माको जाना' इस वाक्यसे अज्ञानके आरोपकी निवृत्तिका ही निरूपण |
२६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| वावेत्' इत्युक्तम्, नात्मनो विषयीकरणम् । | किया गया है, आत्माको विषय करना नहीं बताया गया। | | तत्कथमवेत् ? इत्याह—अहं दृष्टेर्द्रष्टा आत्मा ब्रह्मास्मि भवामीति | उस ब्रह्मने किस प्रकार जाना ? सो श्रुति बतलाती है, मैं दृष्टिका द्रष्टा आत्मा ब्रह्म हूँ—ऐसा जाना । | | ब्रह्मेति-यत्साक्षादपरोक्षात्सर्वान्तर आत्मा अशनायाद्यतीतो नेति नेत्यस्थूलमण्वित्येवमादिलक्षणम्, तदेवाहर्मास्म, नान्यः संसारी, यथा भवानाहेति । | ब्रह्म अर्थात् जो साक्षात् अपरोक्ष सर्वान्तर आत्मा, क्षुधादि विकारोंसे रहित, 'नेति-नेति' वाक्यप्रतिपादित, अस्थूल, असूक्ष्म इत्यादि प्रकारके लक्षणोंवाला है, वही मैं हूँ; जैसा कि आप कहते हैं मैं अन्य यानी संसारी नहीं हूँ । अतः इस प्रकार- | | तस्मादेवं विज्ञानात्तद्ब्रह्म सर्वमभवत्—अब्रह्माध्यारोपापगमात् तत्कार्यस्यासर्वत्वस्य निवृत्त्या सर्वमभवत् । तस्माद्युक्तमेव मनुष्या मन्यन्ते यद्ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्याम इति । | के विज्ञानसे वह ब्रह्म सर्वरूप हो गया । अर्थात् अब्रह्मरूप अध्यारोपके बाधसे उसके कार्यभूत असर्वत्वकी निवृत्ति हो जानेसे वह सर्वरूप हो गया । अतः मनुष्य जो ऐसा मानते हैं कि ब्रह्मविद्याके द्वारा हम सर्वरूप हो जायेंगे, वह उचित ही है । | | यत्पृष्टम्, 'किमु तद्ब्रह्मावेद्यस्मात्तत्सर्वमभवत्' इति, तन्निर्णीतम्—'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत्सर्वमभवत्' इति । | [ इस प्रकार ] यह जो पूछा गया था कि 'उस ब्रह्मने क्या जाना जिससे वह सर्व हो गया' उसका 'पहले यह ब्रह्म ही था; उसने आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ, अतः वह सर्व हो गया' इस वाक्यसे निर्णय कर दिया गया । |
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २६५
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २६५
| [ब्रह्मविद्या देवा-दीनां सर्वात्म्य-प्रतिपादनम्]<br><br>तत्तत्र यो यो देवानां मध्ये प्रत्यबुध्यत प्रतिबुद्धवानात्मानं यथोक्तेन विधिना, स एव प्रतिबुद्ध आत्मा तद्ब्रह्माभवत् । तथर्षीणां तथा मनुष्याणां च मध्ये । देवानामित्यादि लोकदृष्ट्यपेक्षया। न ब्रह्मत्वबुद्ध्योच्यते। 'पुरः पुरुष आविशत्' इति सर्वत्र ब्रह्मैवानुप्रविष्टमित्यवोचाम। अतः शरीराद्युपाधिजनितलोकदृष्ट्यपेक्षया देवानामित्याद्युच्यते । परमार्थतस्तु तत्र तत्र ब्रह्मैवाग्र आसीत्प्राक्प्रतिबोधाद् देवादि-शरीरेष्वन्यथैव विभाव्यमानम् । तदात्मानमेवावेत्तथैव च सर्वमभवत् । | अतः देवताओंमेंसे जिस-जिसने आत्माको उपर्युक्त प्रकारसे जाना वही बोधवान् आत्मा वह अर्थात् ब्रह्म हो गया । इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्योंमें भी हुआ । यहाँ 'देवानाम्' इत्यादि जो कथन है वह लोकदृष्टिको लेकर है, ब्रह्मत्वबुद्धिसे ऐसा नहीं कहा जाता, क्योंकि 'पुरुषने शरीररूप पुरमें प्रवेश किया' इस वाक्यसे हम बतला चुके हैं कि सर्वत्र ब्रह्म ही अनुप्रविष्ट हुआ । अतः शरीरादि-उपाधिजनित लोकदृष्टिकी अपेक्षासे 'देवानाम्' इत्यादि कहा गया है । परमार्थतः तो पहले उन-उन देवादि शरीरोंमें बोध होनेसे पूर्व अन्यरूपसे भावना किया जाता हुआ ब्रह्म ही था । उसने आत्माको जाना और उसी प्रकार सर्वरूप हो गया । | | अस्या ब्रह्मविद्यायाः सर्वभावापत्तिः फलमित्येतस्यार्थस्य द्रढिम्ने मन्त्रानुदाहरति श्रुतिः । कथम् ? तद् ब्रह्म एतदात्मानमेव 'अहमस्मि' इति पश्यन्नेतस्मादेव ब्रह्मणो दर्शनादृषिर्वामदेवाख्यः | इस ब्रह्मविद्याका फल सर्वभावकी प्राप्ति है; इसी बातको दृढ़ करनेके लिये श्रुति मन्त्र उद्धृत करती है । किस प्रकार उद्धृत करती है ? उस ब्रह्मको इस प्रकार देखनेवाले अर्थात् अपनेको ही 'मैं ब्रह्म हूँ'—ऐसा समझनेवाले वामदेवनामक ऋषिको इस |
२६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
२६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय १
| प्रतिपेदे ह प्रतिपन्नवान्किल। स एतस्मिन्ब्रह्मात्मदर्शनेऽवस्थित एतान्मन्त्रान्ददर्श—'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' इत्यादीन्। 'तदेतद्ब्रह्म पश्यन्' इति ब्रह्मविद्या परामृश्यते। 'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' इत्यादिना सर्वभावापत्तिं ब्रह्मविद्याफलं परामृशति। पश्यन्सर्वात्मभावं फलं प्रतिपेद इत्यस्मात्प्रयोगाद् ब्रह्मविद्यासहायसाधनसाध्यं मोक्षं दर्शयति; भुञ्जानस्तृप्यतीति यद्वत्। | ब्रह्मके दर्शनसे ही यह प्रतिपत्ति हुई—यह ज्ञान हुआ। इस ब्रह्मात्मदर्शनमें स्थित होकर उसने इन 'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' इत्यादि मन्त्रोंका साक्षात्कार किया।<br>'तदेतद्ब्रह्म पश्यन्' इस वाक्यसे श्रुति ब्रह्मविद्याका परामर्श करती है तथा 'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' इत्यादि वाक्यसे ब्रह्मविद्याके फल सर्वभावकी प्राप्तिका परामर्श करती है। ब्रह्मको देखनेवाले वामदेव ऋषि सर्वात्मभावरूप फलको प्राप्त हुए—इस प्रयोगसे वह मोक्षको ब्रह्मविद्याके सहायभूत साधनोंसे साध्य दिखलाती है, जैसे कि भोजन करनेवाला तृप्त होता है।^३ |
| सेयं ब्रह्मविद्यया सर्वभावापत्तिरासीन्महतां देवादीनां वीर्यातिशयात्। नेदानीमैंदंयुगीनानां विशेषतो मनुष्याणाम्, अल्पवीर्यत्वादिति स्यात्कस्यचिद्बुद्धिः, तदुत्थापनायाह— | ब्रह्मविद्याके द्वारा वह यह सर्वभावकी प्राप्ति देवादि महापुरुषोंको उनमें विशेष सामर्थ्य होनेके कारण हो गयी थी। अब वर्तमान युगके प्राणियोंको और उनमें भी अल्पवीर्य होनेके कारण मनुष्योंको उसकी प्राप्ति नहीं हो सकती—ऐसा यदि किसीका विचार हो तो उसे निवृत्त करनेके लिये श्रुति कहती है— |
१. मैं मनु हुआ और सूर्य भी। २. उस इस ब्रह्मको देखते हुए। ३. इस वाक्यमें जैसे भोजन-क्रिया तृप्तिका साधन प्रतीत होती है, उसी प्रकार मुक्तिका साधन ब्रह्मविद्या है।
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६७
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६७
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| तदिदं प्रकृतं ब्रह्म यत्सर्वभूतानुप्रविष्टं दृष्टिक्रियादिलिङ्गम्, एतर्हि तस्मिन्नपि वर्तमानकाले यः कश्चिद्व्यावृत्तबाह्यौत्सुक्य आत्मानमेवैवं वेद 'अहं ब्रह्मास्मि' इति—अपोह्योपाधिजनितभ्रान्तिविज्ञानाध्यारोपितान्विशेषान् संसारधर्मानागन्धितमनन्तरमबाह्यं ब्रह्मैवाहमस्मि केवलमिति—सोऽविद्याकृतासर्वत्वनिवृत्तेर्ब्रह्मविज्ञानादिदं सर्वं भवति । न हि महावीर्येषु वामदेवादिषु हीनवीर्येषु वा वार्तमानिकेषु मनुष्येषु ब्रह्मणो विशेषस्तद्विज्ञानस्य वास्ति । | उस इस प्रकृत ब्रह्मको, जो समस्त भूतोंमें अनुप्रविष्ट है तथा दृष्टि-क्रियादि जिसके लिङ्ग हैं, इस समय अर्थात् इस वर्तमानकालमें भी जो कोई बाह्य विषयोंकी अभिलाषासे मुक्त होकर आत्माको ही 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार जानता है अर्थात् उपाधिजनित मिथ्या ज्ञानसे आरोपित विशेषोंका बाध कर जो ऐसा अनुभव करता है कि मैं जिसमें संसारधर्मोंकी गंध भी नहीं है ऐसा अन्तर-बाह्यशून्य शुद्ध ब्रह्म ही हूँ, वह अविद्याकृत असर्वत्वकी निवृत्ति हो जानेसे ब्रह्मज्ञानके द्वारा यह सर्व हो जाता है । महान् प्रभावशाली वामदेवादि अथवा मन्दवीर्य आधुनिक पुरुषोंमें ब्रह्म अथवा उसके विज्ञानका कोई अन्तर नहीं है। |
| वार्तमानिकेषु पुरुषेषु तु ब्रह्मविद्याफले अनैकान्तिकता शङ्क्यत (ब्रह्मविद्या-माहात्म्यम्) इत्यत आह—तस्य ह ब्रह्मविज्ञातुर्यथोक्तेन विधिना देवा महावीर्याश्च नापि अभूत्य-अभवनाय ब्रह्मस्वभावस्य, नेशते न पर्याप्ताः, किमुतान्ये । | आधुनिक पुरुषोंमें ब्रह्मविद्याके फलकी अनिश्चितताकी शङ्का की जाती है, अतः श्रुति कहती है—महाप्रभावशाली देवगण भी उपर्युक्त विधिसे उस ब्रह्मको जाननेवालेकी अभूतिका अर्थात् ब्रह्मरूप सर्वभावको न होने देनेका सामर्थ्य नहीं रखते, फिर ओरोंकी तो बात ही क्याहै ? |
२६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १
| २६८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| ब्रह्मविद्याफलप्राप्तौ विघ्नकरणे देवेभ्यः कथं विघ्नशङ्का <br><br> ब्रह्मविद्याफलप्राप्तौ देवादय ईशत इति का शङ्का ? इत्युच्यते—देवादान्प्रति ऋणवत्त्वान्मर्त्यानाम्। "ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः" इति हि जायमानमेवर्णवन्तं पुरुषं दर्शयति श्रुतिः। पशुनिदर्शनाच्च "अथोऽयं वा" (बृ० उ० १ । ४ । १६) इत्यादिश्लोकश्रुतेश्चात्मनो वृत्तिपरिपालयिषयाधमर्णानिव देवाः परतन्त्रान्मनुष्यान्प्रत्यमृतत्वप्राप्तिं प्रति विघ्नं कुर्युरिति न्याय्यैवैषा शङ्का। <br><br> स्वपशून्स्वशरीराणीव च रक्षन्ति देवाः। महत्तरां हि वृत्तिं कर्माधीनां दर्शयिष्यति देवादीनां बहुपशुसमतयैकैकस्य पुरुषस्य। "तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनु- | किंतु ब्रह्मविद्याके फलकी प्राप्तिमें विघ्न करनेमें देवादि समर्थ होते हैं—ऐसी शङ्का क्यों होती है ? इसपर कहते हैं—क्योंकि देवातिके प्रति मनुष्य ऋणवान् हैं, जैसा कि "ब्रह्मचर्यके द्वारा ऋषियोंसे, यज्ञद्वारा देवताओंसे और पुत्रोत्पादनद्वारा पितरोंसे [ उऋण हो ]" यह श्रुति जन्ममात्रसे ही पुरुषको ऋणी दिखाती है तथा "अथो¹ अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः" इस श्रुतिसे मनुष्यको पशुरूप बतलाया जानेके कारण जिस प्रकार उत्तमर्ण (ऋण देनेवाला) अधमर्णों (ऋण लेनेवालों) को कष्ट देता है उसी प्रकार देवगण भी अपनी वृत्तिका निर्वाह करनेके लिये परतन्त्र मनुष्योंके प्रति अमृतत्वप्राप्तिमें विघ्न करें—यह शङ्का न्याय्य ही है। <br><br> देवगण अपने इन पशुओंकी अपने शरीरोंके समान रक्षा करते हैं। एक-एक पुरुषकी अनेकों पशुओंसे समता करके श्रुति उसे देवादि-की बहुत बड़ी कर्माधीन वृत्ति दिखलायगी और यह भी कहेगी कि "अतः उन्हें यह प्रिय नहीं है |
१. यह प्रसिद्ध आत्मा समस्त भूतोंका भोग्य है ।
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २६९
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २६९
| संस्कृत | हिन्दी |
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| ष्या विद्युः” ( १ । ४ । १० ) इति हि वक्ष्यति । “यथा ह वै स्वाय लोकायारिष्टमिच्छेदेवँ हैवंविदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति” ( १ । ४ । १६ ) इति च । | कि मनुष्य इस आत्मतत्त्वको जानें”। तथा आगे चलकर यह भी कहेगी कि “जिस प्रकार पुरुष अपने शरीरका अविनाश चाहते हैं उसी प्रकार जो ऐसा (देवताओंसे उऋण होनेके लिये अपना कर्त्तव्य) जानता है उसका देवादि समस्त भूत अविनाश चाहते हैं”। |
| ब्रह्मवित्त्वे परार्थ्यनिवृत्तेर्न स्वलोकत्वं पशुत्वञ्चेत्यप्रियारिष्टवचनाभ्यामवगम्यते । तस्माद्ब्रह्मविदो ब्रह्मविद्याफलप्राप्तिं प्रति कुर्युुरेव विघ्नं देवाः, प्रभाववन्तश्च हि ते । | किंतु ब्रह्मज्ञान हो जानेपर परार्थ्य (अन्यका उपभोग होना) निवृत्त हो जानेसे उसके देहात्मत्व और देवपशुत्व नहीं रहते—यह अभिप्राय उपर्युक्त अप्रिय और अरिष्टवाक्योंसे विदित होता है। अतः ब्रह्मवेत्ताको ब्रह्मविद्याका फल प्राप्त होनेमें देवगण विघ्न करेंगे ही और वे हैं भी प्रभावशाली। |
| नन्वेवं सत्यन्यास्वपि कर्मफलप्राप्तिषु देवानां विघ्नकरणं पेयपानसमम् 1। हन्त तर्हि विस्रम्भोऽभ्युदयनिःश्रेयससाधनानुष्ठानेषु । तथेश्वरस्याचिन्त्यशक्तित्वाद्दिघ्नकरणे प्रभुत्वम् । तथा कालकर्ममन्त्रौषधितपसाम् । | **शङ्का—**ऐसी बात है तो अन्य कर्मफलोंकी प्राप्तिमें विघ्न करना भी देवताओंके लिये जल पीनेके समान [सुलभ] है। तब तो अभ्युदय (भोग) और निःश्रेयस (मोक्ष) के साधनोंके अनुष्ठानमें विश्वास नहीं हो सकता। इसी प्रकार अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न होनेके कारण ईश्वर भी विघ्न करनेमें समर्थ हैं ही। तथा काल, कर्म, मन्त्र, ओषधि और तपका भी बहुत बड़ा प्रभाव है। शास्त्र एवं |
Footnotes
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पार्श्व-टिप्पणी: विघ्नभयाच्छास्त्रार्थसम्पादनाविस्त्रम्भ इत्याशङ्कयते ↩