बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 259, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 259
| ब्राह्मण ४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २५३ |
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| संस्कृत मूल (भाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
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| विदित्वात्मानमेवाहं ब्रह्मास्मीति सर्वमभवत्तस्य संसारात्मविज्ञानादेव सर्वात्मभावस्य फलस्य सिद्धत्वात्परब्रह्मोपदेशस्य ध्रुवमानर्थक्यं प्राप्तम्। | होते हुए अपनेको 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा जानकर सर्वरूप हो गया तो उसे संसारी जीवके विज्ञानसे ही सर्वात्मभावरूप फल प्राप्त होनेके कारण परब्रह्मोपदेशकी निश्चय ही व्यर्थता प्राप्त हुई। |
| तद्विज्ञानस्य क्वचित्पुरुषार्थसाधनेऽविनियोगात्संसारिण एवाहं ब्रह्मास्मीति ब्रह्मत्वसम्पादनार्थ उपदेश इति चेत्। अनिज्ञाते हि ब्रह्मस्वरूपे किं सम्पादयेदहं ब्रह्मास्मीति। निर्ज्ञातलक्षणे हि ब्रह्मणि शक्या सम्पत्कर्तुम्। | पूर्व०—ब्रह्मज्ञानका कहीं पुरुषार्थके साधनमें विनियोग न होनेके कारण संसारी जीवको ही 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार ब्रह्मभाव सम्पादन करानेके लिये यह उपदेश हो तो? ब्रह्मका स्वरूप अच्छी तरह जाने बिना 'मैं ब्रह्म हूँ' इस उपदेशसे संसारी जीव क्या सम्पादन कर सकता है? क्योंकि ब्रह्मके लक्षणोंका सम्यक् प्रकारसे ज्ञान हो जानेपर ही [ब्रह्मरूपताका] सम्पादन किया जा सकता है। |
| न; “अयमात्मा ब्रह्म” (बृ० उ० २।५।१९) “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” (३।४।१) “य आत्मा” (छा० उ० ८।७।१) “तत्सत्यं स आत्मा” (छा० उ० ६।८।७) “ब्रह्मविदाप्नोति परम्” (तै० उ० २।१।१) इति प्रकृत्य “तस्माद्वा एतस्मादात्मनः” (२।१।१) | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है। “यह आत्मा ब्रह्म है,” “जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है”, ‘जो आत्मा अपहतपाप्मा,’ “वह सत्य है, वह आत्मा है”, तथा “ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता है” इस प्रकार प्रसङ्ग उठाकर “उस इस आत्मासे [आकाश उत्पन्न हुआ]” इत्यादि |