भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 258
२५२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

मुमुक्षोश्च गतिमार्गविशेषदेशोपदेशात् । असति भेदे कस्य कुतो गतिः स्यात् ? तदभावे च दक्षिणोत्तरमार्गविशेषानुपपत्तिः, गन्तव्यदेशानुपपत्तिश्चेति । भिन्नस्य तु परमादात्मनः सर्वमेतदुपपन्नम् ।तथा मुमुक्षुके लिये [देवयानादि] गति और [अर्चिरादि] मार्गविशेषका उपदेश होनेके कारण भी [ऐसा ही जान पड़ता है]। यदि भेद न हो तो किसका कहाँसे गमन होगा ? और गतिका अभाव माना जाय तो दक्षिणायन-उत्तरायणसंज्ञक मार्गविशेषोंकी तथा गन्तव्य देशकी उपपत्ति नहीं हो सकती। परमात्मासे भिन्न आत्माके लिये तो यह सभी उपपन्न हो सकता है।
कर्मज्ञानसाधनोपदेशाच्च—<br><br>भिन्नश्चेदूब्रह्मणः संसारी स्यात्, युक्तस्तं प्रत्यभ्युदयनिःश्रेयससाधनयोः कर्मज्ञानयोरुपदेशो नेश्वरस्याप्तकामतत्वात् । तस्माद्युक्तं ब्रह्मेति ब्रह्मभावी पुरुष उच्यत इति चेत् ?कर्म और ज्ञानरूप साधनोंका उपदेश होनेके कारण भी [उनका भेद है]। यदि संसारी जीव ब्रह्मसे भिन्न होगा तभी उसके लिये भोग और मोक्षके साधनभूत कर्म और ज्ञानका उपदेश हो सकेगा, ईश्वरको इनका उपदेश नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह तो आप्तकाम है। अतः यही ठीक है कि 'ब्रह्म' शब्दसे भविष्यमें ब्रह्मभावको प्राप्त होनेवाला पुरुष ही कहा गया है— ऐसा मानें तो ?
न; ब्रह्मोपदेशानर्थक्यप्रसङ्गात् । संसारी चेद्ब्रह्मभाव्यब्रह्म सन्<br>(भेदवाद-निरसनम्)**सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि तब तो ब्रह्मोपदेशकी ही व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा। यदि भविष्यमें ब्रह्मभावको प्राप्त होनेवाला संसारी ही अब्रह्म