बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 262, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| २५६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| तथा सर्वशाखोपनिषत्सु च ब्रह्मैकत्वविज्ञानं निश्चितोऽर्थः । तत्र यदि संसारी ब्रह्मणोऽन्य आत्मानमेवावेदिति कल्प्येत, इष्टस्यार्थस्य बाधनं स्यात् । तथा च शास्त्रमुपक्रमोपसंहारयोर्विरोधादसमञ्जसं कल्पितं स्यात् । | इसी प्रकार सम्पूर्ण शाखाओंके उपनिषदोंमें भी ब्रह्मैकत्व-विज्ञान ही निश्चित अर्थ है, वहाँ यदि ऐसी कल्पना की जाय कि ब्रह्मसे भिन्न संसारी जीवने अपनेको ही जाना तो इष्ट अर्थका बाध होगा । इससे 'उपक्रम और उपसंहारमें विरोध होनेके कारण शास्त्र असंगत है' ऐसी कल्पना हो जायगी । | | व्यपदेशानुपपत्तेश्च । यदि च 'आत्मानमेवावेत्' इति संसारी कल्प्येत, ब्रह्मविद्या इति व्यपदेशो न स्यात् । आत्मानमेवावेदिति संसारिण एव वेद्यत्वोपपत्तेः । | व्यपदेश (नाम) की अनुपपत्ति होनेसे भी [ संसारी जीव 'ब्रह्म' शब्दका वाच्य नहीं हो सकता ] । यदि 'आत्मानमेवावेत्' इस वाक्यमें 'जानना' इस क्रियाका कर्ता संसारी जीव माना जाय तो इस विद्याका 'ब्रह्मविद्या' यह नाम नहीं हो सकता; क्योंकि 'अपनेको ही जाना' इस वाक्यके अनुसार [ संसारी जीवका ] स्वयं संसारी जीव ही वेद्य होना सम्भव है । | | आत्मेति वेदितुरन्यदुच्यत इति चेन्न, अहं ब्रह्मास्मीति विशेषणात् । अन्यश्चेद्ध्येयः स्यादयमसाविति वा विशेष्येत न त्वहमस्मीति । अहमस्मीति विशेषणादात्मानमेवा- | यदि कहो कि 'आत्मा' इस शब्दसे कहा हुआ वेद्य वेत्तासे भिन्न बतलाया गया है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उसे 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार [ अहंरूपसे ] विशेषित किया गया है । यदि वेद्य वेत्तासे भिन्न होता तो उसे 'यह' अथवा 'वह' कहकर विशेषित किया जाता 'मैं हूँ' ऐसा कहकर नहीं । 'मैं हूँ' इस प्रकार विशेषित |