बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 263, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २६७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| वेदिति चावधारणान्निश्चितमात्मैव ब्रह्मेत्यवगम्यते । तथा च सत्युपपन्नो ब्रह्मविद्याव्यपदेशो नान्यथा । संसारिविद्या ह्यन्यथा स्यात् । न च ब्रह्मत्वाब्रह्मत्वे ह्येकस्योपपन्ने परमार्थतः, तमःप्रकाशाविव भानोर्विरुद्धत्वात् । | करनेसे और 'अपनेको ही जाना' ऐसा निश्चय करनेसे यह निश्चितरूपसे ज्ञात होता है कि स्वयं आत्मा ही ब्रह्म है। ऐसा होनेपर ही इस विद्याका 'ब्रह्मविद्या' यह नाम उपपन्न हो सकता है और किसी प्रकार नहीं। अन्यथा माननेपर तो इसका नाम 'संसारिविद्या' होगा। जिस प्रकार विरुद्ध होनेके कारण अन्धकार और प्रकाश ये दोनों ही सूर्यके धर्म नहीं हो सकते उसी प्रकार एक ही आत्माके ब्रह्मत्व और अब्रह्मत्व ये दोनों धर्म परमार्थतः उपपन्न नहीं हो सकते। |
| न चोभयनिमित्तत्वे ब्रह्मविद्येति निश्चितो व्यपदेशो युक्तः। तदा ब्रह्मविद्या संसारिविद्या च स्यात् । न च वस्तुनोऽर्धजरतीयत्वं कल्पयितुं युक्तं तत्त्वज्ञानविवक्षायाम्, श्रोतुः संशयो हि तथा स्यात् । निश्चितं च ज्ञानं पुरुषार्थसाधनमिष्यते "यस्य | इसके सिवा यदि प्रस्तुत विज्ञानके ये दोनों ही निमित्त हों तो भी उसका 'ब्रह्मविद्या' यह निश्चित व्यपदेश उपपन्न नहीं है। उस अवस्थामें वह ब्रह्मविद्या और संसारिविद्या भी कहलायेगी और तत्त्वज्ञानका निरूपण करना अभीष्ट होनेपर वस्तुके विषयमें अर्धजरतीय-कल्पना करनी उचित नहीं है; क्योंकि ऐसा करनेपर सुननेवालेको संदेह होगा। पुरुषार्थका साधन तो निश्चित ज्ञान ही माना जाता है; जैसा कि |
१. एक ही वस्तुके विषयमें दो विरुद्ध कल्पना करना अर्धजरतीयन्याय कहलाता है; जैसे कोई कहे कि आधी गाय तो बूढ़ी हो गयी है ओर आधी बच्चा देनेमें समर्थ है।
बृ० उ० १७—