भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 264
२५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| स्यादद्धा न विचिकित्सास्ति” (छा० उ० ३।१४।४) “संशयात्मा विनश्यति” (गीता ४।४०) इति श्रुतिस्मृतिभ्याम् । अतो न संशयितो वाक्यार्थो वाच्यः परहितार्थिना । | “जिसका ऐसा निश्चय है और जिसे इस विषयमें कोई संदेह भी नहीं है [ उसे ही ब्रह्म-साक्षात्कार होता है ]” इस श्रुतिसे और “संशयात्मा नष्ट हो जाता है” इस स्मृतिसे सिद्ध होता है। अतः दूसरोंका हित चाहनेवाले पुरुषको वाक्यका संशययुक्त अर्थ नहीं करना चाहिये। | | ब्रह्मणि साधकत्वकल्पना अस्मदादिष्विवापेशाला ‘तदात्मानमेवावेत्तस्मात्तत्सर्वमभवत्’ इति—इति चेत् ? | पूर्व०—किंतु ‘उसने अपनेको ही जाना [ कि मैं ब्रह्म हूँ ] अतः वह सर्व हो गया’ इस वाक्यके अनुसार हमलोगोंकी तरह ब्रह्ममें साधकत्वकी कल्पना करनी तो अच्छी नहीं है ? | | न, शास्त्रोपालम्भात् । न ह्यस्मत्कल्पनेयम्, शास्त्रकृता तु; तस्माच्छास्त्रस्यायमुपालम्भः । न च ब्रह्मण इष्टं चिकीर्षुणा शास्त्रार्थविपरीतकल्पनया स्वार्थपरित्यागः कार्यः । न चैतावत्येवाक्षमा युक्ता भवतः । सर्वं हि नानात्वं ब्रह्मणि कल्पितमेव “एकधैवानुद्रष्टव्यम्” (बृ० उ० ४।४।२०) “नेह नानास्ति किञ्चन” (४।४।१९) “यत्र हि द्वैतमिव भवति” (२।४।१४) “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६।२।१) इत्यादिवा- | सिद्धान्ती—ऐसा न कहो, क्योंकि यह उपालम्भ शास्त्रके लिये है। यह हमारी कल्पना नहीं है, अपितु शास्त्रकी की हुई है, अतः यह शास्त्रके ही लिये उपालम्भ है। और ब्रह्मका इष्ट करनेकी इच्छावाले पुरुषको शास्त्रके अर्थसे विपरीत कल्पना करके उसके अर्थका परित्याग नहीं करना चाहिये। आपके लिये इतनी अक्षमा उचित नहीं है । सारा नानात्व ब्रह्ममें कल्पित ही है। “उसे एकरूप ही देखना चाहिये”, “यहाँ नाना कुछ भी नहीं है”, “जहाँ द्वैत-सा होता है”, “एक ही अद्वितीय ब्रह्म है” इत्यादि सैकड़ों |

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