बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 265, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २५९
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| क्यशतेभ्यः। सर्वो हि लोकव्यवहारो ब्रह्मण्येव कल्पितो न परमार्थः सन्, इत्यत्यल्पमिदमुच्यते ‘इयमेव कल्पना अपेशला’ इति। | वाक्योंसे यही बात कही गयी है। ब्रह्ममें तो सारा ही लोकव्यवहार कल्पित ही है; यह परमार्थतः सत् नहीं है; अतः ‘यही कल्पना अच्छी नहीं है’ यह तो तुम बहुत छोटी बात कहते हो। |
| तस्माद् यत्प्रविष्टं स्रष्टृ ब्रह्म तद्ब्रह्म। वैशब्दोऽवधारणार्थः। इदं शरीरस्थं यद् गृह्यते, अग्रे प्राक्प्रतिबोधादपि ब्रह्मैवासीत्, सर्वं चेदम्। किन्त्वप्रतिबोधात् अब्रह्मास्म्यसर्वं च’ इत्यात्मन्यध्यारोपात् ‘कर्ताहं क्रियावान्फलानां च भोक्ता सुखी दुःखी संसारी’ इति चाध्यारोपयति। परमार्थतस्तु ब्रह्मैव तद्विलक्षणं सर्वं च। तत्कथञ्चिदाचार्येण दयालुना प्रतिबोधितम् ‘नासि संसारी’ इत्यात्मानमेवावेत्स्वाभाविकम्। अविद्याध्यारोपितविशेषवर्जितमिति एवशब्दस्यार्थः। | अतः जो सृष्टिकर्ता ब्रह्म प्रविष्ट हुआ था, वही यह ब्रह्म है। ‘ब्रह्म वै’ इसमें ‘वै’ शब्द निश्चयार्थक है। ‘इदम्’ अर्थात् यह जो शरीरमें स्थित दिखायी देता है ‘अग्रे’—बोध होनेसे पूर्व भी ब्रह्म ही था तथा यह सर्व भी था। किंतु अज्ञानवश आत्मामें ‘मैं अब्रह्म हूँ, असर्व हूँ’ ऐसा आरोप कर लेनेसे ‘मैं कर्ता हूँ, क्रियावान् हूँ, फलोंका भोक्ता हूँ, सुखी हूँ, दुःखी हूँ और संसारी हूँ’ ऐसा अध्यारोप कर लेता है। वस्तुतः तो वह उससे विलक्षण ब्रह्म और सर्वरूप ही है। उसने दयालु आचार्यद्वारा किसी प्रकार ‘तू संसारी नहीं है’ ऐसा बोध कराये जानेपर स्वाभाविक आत्माको ही जाना। ‘आत्मानमेव’ इसमें ‘एव’ शब्दका यह अभिप्राय है कि ‘उसने अविद्याद्वारा आरोपित विशेषसे रहित-निर्विशेष आत्माको जाना।’ |
| ब्रूहि कोऽसावात्मा स्वाभा- | पूर्व०-अच्छा, बताओ वह स्वा- |